Friday, March 6, 2026

गुरुचरित्र- अध्याय १

 

गुरुचरित्र 

अध्याय १-मंगलाचरण 

सिद्धमुनी आणि नामधारकाची भेट

(ओवीसंख्या १४९)

॥ ॐ ॥

या अध्यायात काय आहे:

गुरुचरित्राचा पहिला अध्याय श्रीगणेशाच्या मंगलस्मरणाने सुरू होतो आणि तत्पश्चात सूतमुनी गुरूच्या परममहिमेचे वर्णन करतात—गुरू हेच ब्रह्मा, विष्णू आणि महेश यांचे एकत्र स्वरूप असून त्यांच्या कृपेनेच जीवाला अज्ञान, दुःख आणि संसारबंधनातून मुक्ती मिळते. नामधारक आपल्या जीवनातील संकटांनी व्याकुळ होऊन गुरूंच्या चरणी प्रार्थना करतो आणि “मी गुरूभक्त असूनही माझ्यावर दुःख का येते?” अशी साधकाच्या मनातील शाश्वत शंका व्यक्त करतो. त्यावर सूतमुनी त्याला शांत करीत म्हणतात की श्रीगुरूंचे चरित्र श्रवण हेच सर्व दुःखनिवारणाचे औषध आहे, आणि याच संवादातून संपूर्ण ग्रंथाचा आध्यात्मिक प्रवास सुरू होतो.

सूची:

  • श्री गणेश स्तुती 
  • श्री सरस्वती स्तुती
  • त्रिदेव-स्मरण
  • समग्र देवदेवतांस वंदन
  • स्वकुळाचा इतिहास
  • गुरुचरित्र लिहिण्याचा संकल्प
  • गुरुचरित्राचा महिमा
  • श्रीनृसिंहसरस्वतींचा (श्रीगुरूंचा) महिमा
  • नामकरणी नावाचा शिष्य श्रीगुरूंना भेटण्याचा निश्चय करतो
  • नामकरणी  श्रीगुरूंची प्रार्थना करतो

🌺 🌺 🌺 

श्रीगणेशाय नमः | श्री सरस्वत्यै नमः | श्रीगुरुभ्यो नमः | श्रीकुलदेवतायै नमः ||

श्रीपादश्रीवल्लभ-श्रीनृसिंहसरस्वती-दत्तात्रेयसद्गुरुभ्यो नमः: ||

श्री गणेश स्तुती 

ॐ नमोजी विघ्नहरा | गजानना गिरिजाकुमरा | जय जय लंबोदरा | एकदंता शूर्पकर्णा || १ ||

हालविशी कर्णयुगुले | तेथूनि जो का वारा उसळे | त्याचेनि वाते विघ्न पळे | विघ्नांतक म्हणती || २ ||

तुझे शोभे अन्न | जैसे तप्त कांचन | किंवा उदित प्रभारमण | तैसे तेज फाकतसे || ३ ||

विघ्नकाननछेदनासी | हाती फरश धरिलासी || नागबंद कटीसी | उरग यज्ञोपवीत || ४ ||

चतुर्भुज दिससी निका | विशालाक्षा विनायका | प्रतिपाळिसी विश्वलोका | निर्विघ्ने करूनिया || ५ ||

तुझे चिंतन जे करिती | त्या विघ्ने न बाधती | सकळाभीष्टे  साधती | अविलंबेसी || ७ ||

सकळ मंगल कार्यासी | प्रथम वंदिजे तुम्हासी | चतुर्दश विद्यांसी | स्वामी तूचि लंबोदरा || ७ ||

वेद शास्त्रे पुराणे | तुझेचि असेल बोलणे | ब्रह्मादिकि या कारणे | स्तविला असे सुरवरी || ८ ||

त्रिपुर साधन करावयासी | ईश्वरे अर्चिले तुम्हासी | संहारावया दैत्यांसी | पहिले तुम्हांसी स्तविले || ९ ||

हरिहर ब्रह्मादिक गणपती | कार्यारंभी तुज वंदिती | सकळाभीष्टे साधती | तुझेनि प्रसादे || १० ||

कृपानिधी गणनाथा | सुरवरदिका विघ्नहर्ता | विनायका अभयदाता | मतिप्रकाश करी मज || ११||

समस्त गणांचा नायक | तूचि विघ्नांचा अंतक |  तूते वंदिती जे लोक | कार्य साधे तयांचे || १२ ||

सकळ कार्या आधारू | तूचि कृपेचा सागरू | करुणानिधि गौरीकुमरू | मतिप्रकाश करी मज || १३ ||

माझे मनींची वासना | तुवा पुरवावी गजानना | साष्टांग करितो नमना | विद्या देई मज आता || १४ ||

नेणता होतो मतिहीन | म्हणोनि धरिले तुझे चरण | चौदा विद्यांचे निधान | शरणागतवरप्रदा || १५ ||

माझिया अंत:करणीचे व्हावे | गुरुचरित्र कथन करावे | पूर्णदृष्टीने पहावे | ग्रंथसिद्धि पाववी दातारा || १६ ||

श्री सरस्वती स्तुती 

आता वंदू ब्रह्मकुमारी | जिचे नाम वागीश्वरी | पुस्तक वीणा जिचे करी | हंसवाहिनी असे देखा || १७ ||

म्हणोनि नसतो तुझे चरणी | प्रसन्न व्हावे मज स्वामिणी | राहोनिया माझिये वाणी | ग्रंथी रिघू करी आता || १८ ||

विद्या वेद शास्त्रांसी | अधिकार जाणा शारदेसी | तिये वंदिता विश्वासी | ज्ञान होय अवधारा || १९ ||

ऐक माझी विनंती | द्यावी आता अवलीला मती | विस्तार करावया गुरुचरित्री | मतिप्रकाश करी मज || २० ||

जय जय जगन्माते | तूचि विश्वी वाग्देवते | वेदशास्त्रे तुझी लिखिते | नांदविशी येणेपरी || २१ ||

माते तुझिया वाग्बाणी | उत्पत्ति वेदशास्त्रीपुराणी | वदता साही  दर्शनी | त्यांते अशक्य परियेसा || २२ ||

गुरूचे नामी तुझी स्थिती | म्हणती नृसिंहसरस्वती | याकारणे मजवरी प्रीति | नाम आपुले म्हणूनी || २३ ||

खांबसूत्रीची बाहुली जैसी | खेळती तया सूत्रासरसी | स्वतंत्रबुधि नाही त्यांसी | वर्तती आणिकाचेनि मते || २४ ||

तैसे तुझेनि अनुमते | माझे जिव्हे प्रेरी माते | कृपानिधि वाग्देवते| म्हणोनि विनवी तुझा बाळ || २५ ||

म्हणोनि नमिले तुझे चरण | व्हावे स्वामिणी प्रसन्न | द्यावे माते वरदान | ग्रंथी रिघू करवी आता || २६ ||

त्रिदेव-स्मरण:

आता वंदू त्रिमूर्तीसी | ब्रह्माविष्णुशिवांसी | विद्या मागे मी त्यांसी | अनुक्रमे करोनी || २७ ||

चतुर्मुखे असती ज्यासी | कर्ता जो का सृष्टीसी | वेद झाले बोलते ज्यासी | त्याचे चरणी नमन माझे || २८ ||

आता वंदू हृषिकेशी | जो नायक त्या विश्वासी | लक्ष्मी सहित अहर्निशी | क्षीरसागरी असे जाणा || २९ ||

चतुर्बाहु नरहरी | शंख चक्र गदा करी | पद्महस्त मुरारी | पद्मनाभ परियेसा || ३० ||

पीतांबर असे कसियेला | वैजयंती माळा गळा | शरणागता अभीष्ट सकळा | देता होय कृपाळू || ३१ ||

आता नमू शिवासी | धरिली गंगा मस्तकेसी | पंचवक्त्र दहा भुजेसी | अर्धांगी असे जगन्माता || ३३ ||

पंचवदने असती ज्यासी | संहारी जो या सृष्टीसी | म्हणोनि बोलती स्मशानवासी | त्यांचे चरणी नमन माझे || ३३ ||

व्याघ्रांबर पांघरून | सर्वांगी असे सर्पवेष्टण | असा शंभु उमारमण | त्याचे चरणी नमन माझे || ३४ ||

समग्र देवदेवतांस वंदन:

नमन समस्त सुरवरा | सिद्धसाध्यां अवतारा | गंधर्वयक्षकिन्नरा| ऋषीश्वरा नमन माझे  || ३६ ||

वंदू आता कविकुळासी |  पराशरादि व्यासांसी| वाल्मीकादि सकळिकांसी |  नमन माझे परियेसा || ३६ ||

नेणे कवित्व असे कैसे | म्हणोनि तुम्हा विनवितसे | ज्ञान द्यावे जी भरवसे | आपुला दास म्हणोनि || ३७ ||

न कळे ग्रंथप्रकार | नेणे शास्त्रांचा विचार | भाषा नये महाराष्ट्र | म्हणोनि विनवी तुम्हासी || ३८ ||

समस्त तुम्ही कृपा करणे | माझिया वचना साह्य होणे | शब्दव्युत्पत्तीही नेणे | कविकुळ तुम्ही प्रतिपाळा || ३९ ||

ऐसे सकळिका विनवोनि | मग ध्याइले पूर्वज मनी | उभयपक्ष जनकजननी || ४० ||

स्वकुळाचा इतिहास:

आपस्तंबशाखेसी | गोत्र कौंडिण्य महाऋषि | साखरे नाम ख्यातिशी |  सायंदेवापासाव || ४१ ||

त्यापासूनि नागनाथ | देवराव तयाचा सुत | सदा श्रीसद्गुरुचरण ध्यात | गंगाधर जनक माझा || ४२ ||

नमन करिता जनकचरणी | मातापूर्वज ध्यातो मनी | जो का पूर्वज नामधारणी | आश्वलायन शाखेचा || ४३ ||

काश्यपाचे गोत्री | चौंडेश्वरी नामधारी | वागे जैसा जन्हु अवधारी | अथवा जनक गंगेचा || ४४ ||

त्याची कन्या माझी जननी | निश्चये जैशी भवानी | चंपा नामें पुण्यखाणी | स्वामिणी माझी परियेसा || ४५ ||

गुरुचरित्र लिहिण्याचा संकल्प:

नमिता जनकजननीसी | नंतर नमू श्रीगुरुसी | घाली मति प्रकाशी | गुरुचरण स्मरावया || ४६ ||

गंगाधराचे कुशी | जन्म झाला परियेसी | सदा  ध्याय श्रीगुरुसी | एका भावे निरंतर || ४७ ||

म्हणोनि सरस्वती गंगाधर | करी संतांसी नमस्कार | श्रोतया विनवी वारंवार | क्षमा करणे बाळकासी || ४८ ||

वेदाभ्यासी संन्यासी | यती योगेश्वर तापसी |  सदा न्यायी श्रीगुरुसी | तयांसी माझा नमस्कार || ४९ ||

विनवितसे समस्तांसी | अल्पमती आपणासी | माझे बोबडे बोलांसी  सकळ तुम्ही अंगिकारा || ५० ||

तावन्मात्र माझी मति | नेणे काव्यव्युत्पत्ति | जैसे श्रीगुरु निरोपिती | तेणे परी सांगत || ५१ ||

पूर्वापार आमुचे वंशी | गुरु प्रसन्न अहर्निशी | निरोप देती माते परियेसी | चरित्र आपुले विस्तारावया || ५२ ||

म्हणे ग्रंथ कथन करी | अमृतघट स्वीकारी | तुझे वंशी परंपरी | लाधती चारी पुरुषार्थ || ५३ ||

गुरुवाक्य मज कामधेनु | मनी नाही अनुमानु | सिद्धि पावविणार आपणु | श्रीनृसिंहसरस्वती || ५४ ||

त्रैमूर्तीचा अवतार | झाला नृसिंहसरस्वती नर | कवण जाणे याचा  पार | चरित्र कवणा न वर्णवे || ५५ ||

चरित्र ऐसे श्रीगुरुचे | वर्णू न शके मी वाचे | आज्ञापन असे श्रीगुरुचे | म्हणोनि वाचे बोलतसे || ५६ ||

गुरुचरित्राचा महिमा:

ज्यास पुत्रपौत्री असे चाड | त्यासी कथा हे असे गोड | लक्ष्मी वसे अखंड | तया भुवनी परियेसा || ५७ ||

ऐशी कथा जयाचे घरी | वाचिती नित्य प्रेमभरी | श्रियायुक्त निरंतरी | नांदती पुत्रकलत्रयुक्त || ५८ ||

रोग नाही तया भुवनी | सदा संतुष्ट गुरुकृपेकरोनि | नि:संदेह साता दिनी | ऐकता बंधन तुटे जाणा || ५९ ||

ऐसी पुण्यपावन कथा | सांगेन ऐक विस्तारता | सायासाविण होय साध्यता | सद्य:फल प्राप्त होय || ६० ||

निधान लाभे अप्रयासी | तरी कष्ट का सायासी | विश्वास माझिया बोलासी | ऐका श्रोते एकचित्ते || ६१ ||

आम्हा साक्षी अप्रयासी | म्हणोनि विनवितसे बळे | श्रीगुरुस्मरण असे भले | अनुभवा हो सकळिक || ६२ ||

तृप्ति झालियावरी ढेकर | देती जैसे जेवणार | गुरुमहिमेचा उद्गार | बोलतसे अनुभवोनि || ६३ ||

मी सामान्य म्हणोनि | उदास व्हाल माझे वचनी | मक्षिकेच्या मुखांतुनी | मधु केवी ग्राह्य होय || ६४ ||

जैसे शिंपल्यात मुक्ताफळ | अथवा कर्पूर कर्दळ | विचारी पा अश्वत्थमूळ | कवणापासाव उत्पत्ति || ६५ ||

ग्रंथ कराल उदास | वाकुड कृष्ण दिसे ऊस | अमृतवत निघे त्याचा रस | दृष्टि द्यावी तयावरी || ६६ ||

तैसे माझे बोलणे | ज्याची चाड गुरुस्मरणे | अंगिकार करणार शहाणे | अनुभविती एकचित्ते || ६७ ||

ब्रह्मरसाची गोडी | अनुभवितां फळे रोकडी | या बोलाची आवडी |  ज्यासी संभवे अनुभव || ६८ ||

गुरुचरित्र कामधेनु | ऐकता होय महाज्ञानु | श्रोती करोनिया सावध मनु | एकचित्ते परियेसा || ६९ ||

श्रीनृसिंहसरस्वतींचा (श्रीगुरूंचा) महिमा:

श्रीगुरु नृसिंहसरस्वती | होते गाणगापुरी ख्याति | महिमा त्यांचा अत्यदृभुती | सांगेन एका एकचित्ते || ७० ||

तया ग्रामी वसती गुरु | म्हणोनि महिमा असे थोरु | जाणती लोक चहू राष्ट्रु | समस्त जाती यात्रेसी || ७१ ||

तेथे राहोनि आराधिती | त्वरित होय फलप्राप्ति | पुत्र दारा धन संपत्ति | जे जे इच्छिले होय जना || ७२ ||

लाधोनिया संताने | नामें ठेविती नामकरणे | संतोषरूपे येऊन | पावती चारी पुरुषार्थ || ७३ ||

नामकरणी नावाचा शिष्य श्रीगुरूंना भेटण्याचा निश्चय करतो : 

ऐसे असता वर्तमानी | भक्त एक 'नामकरणी' | कष्टतसे अति गहनी | सदा ध्याय श्रीगुरुसी || ७४ ||

ऐसे मनी व्याकुळित | चिंतेने वेष्टिला बहुत | गुरुदर्शना जाऊ म्हणत | निर्वाणमानसे निघाला || ७५ ||

अति निर्वाण अंत:करणी | लय होवोनि गुरुचरणी | जातो शिष्यशिरोमणी | विसरोनिया क्षुधातृषा || ७६ ||

निर्धार करोनि मानसी | म्हणे पाहीन श्रीगुरुसी | अथवा सांडीं देहासी | जडस्वरूपे काय काज || ७७ ||

नामकरणी  श्रीगुरूंची प्रार्थना करतो:

ज्याचे नामस्मरण करिता | दैन्यहानि होय त्वरिता | आपण तैसे नामांकिता | किंकर म्हणतसे || ७८ ||

दैव असे आपुले उणे | तरी का भजावे श्रीगुरुचरण | परिस लावता लोहा जाण‌ | सुवर्ण केवी होतसे || ७९ ||

तैसे तुझे नाम परिसे | माझे हृदयी सदा वसे | माते कष्टी सायासे | ठेविता लाज कविताही || ८० ||

या बोलाचिया हेवा | मनी धरोनि पहावा | गुरुमूर्ती सदाशिवा | कृपाळू बा सर्वभूती || ८१ ||

अतिव्याकुळ अंत:करणी | निंदास्तुति आपुली वाणी | कष्टला भक्त नामकरणी | करिता होय परियेसा || ८२ ||

राग स्वेच्छा ओवीबद्ध म्हणावे | आजि पाहुणे पंढरीचे रावे | वंदू विघ्नहरा भावे | नमू ते सुंदरा शारदेसी || ८३ ||

गुरूची त्रैमूर्ति | म्हणती वेदश्रुति | सांगती दृष्टांती | कलियुगात || ८४

कलियुगात ख्याति | श्रीनृसिंहसरस्वती | भक्तांसी सारथी | कृपासिंधु || ८५ ||

कृपासिंधु भक्ता | वेद वाखाणिता | त्रयमूर्ति गुरुकृपा | म्हणोनिया || ८६ ||

त्रयमूर्तीचे गुण | तू एक निधान | भक्तांसी रक्षण | दयानिधि || ८७ ||

दयानिधि यती | विनवितो मी श्रीपती | नेणे भावभक्ति  | अंत:करणी || ८८ ||

अंत:करणी स्थिरु | नव्हे बा श्रीगुरु | तू कृपासागरु | पाव वेगी || ८९ ||

पाव वेगी आता | नरहरी अनंता | बाळालागी माता | केवी टाकी || ९० ||

तू माता तू पिता | तूचि सखा भ्राता | तूचि कुळदेवता | परंपरी || ९१ ||

वंशपरंपरी | धरूनि निर्धारी | भजतो मी नरहरी | सरस्वतीसी || ९२ ||

सरस्वती नरहरी | दैन्य माझे हरी | म्हणूनि मी निरंतरी | सदा कष्टे वारी || ९३ ||

सदा कष्टी चित्ता | का हो देशी आता | कृपासिंधु भक्ता | केवी होसी || ९४ ||

कृपासिंधु भक्ता | कृपाळू अनंता | त्रयमूर्ति जगन्नाथा | दयानिधी || ९५ ||

त्रयमूर्ति तू होसी | पाळिसी विश्वासी | समस्त देवांसी | तूचि दाता || ९६ ||

समस्ता देवांसी | तूचि दाता होसी | मागो मी कवणासी | तुजवांचोनी || ९७ ||

तुजवाचोनी आता | असे कवण दाता | विश्वासी पोषिता | सर्वज्ञ तू || ९८ ||

सर्वज्ञाची खूण | असे हे लक्षण | समस्तांचे जाणे (= समस्तांचे भूत, वर्तमान, भविष्य जाणणे)| कवण ऐसा || ९९ ||

सर्वज्ञ म्हणोनि | वानिती पुराणी | माझे अंत:करणी | न ये साक्षी (=अनुभूती येत नाही) || १०० ||

कवण कैशापरी | असती भूमीवरी | जाणिजेचि तरी | सर्वज्ञ तो || १०१ ||

बाळक तान्हये | नेणे बापमाये | कृपा केवी होय | मातापित्या || १०२ ||

दिलियावांचोनि | न देववे म्हणोनि | असेल तुझे मनी | सांग मज || १०३ ||

समस्त महीतळी | तुम्हा दिल्हे बळी | त्याते हो पाताळी | बैसविले || १०४ ||

सुवर्णाची लंका | तुवा दिल्ही एका | तेणे पूर्वी लंका कवणा दिल्ही || १०५ ||

अढळ ध्रुवासी | दिल्हे हृषिकेशी | त्याने हो तुम्हासी काय दिल्हे || १०६ ||

नि:क्षत्र करूनी | विप्राते मेदिनी | देता तुम्हा कोणी | काय दिल्हे || १०७ ||

सृष्टीचा पोषक | तूचि देव एक | तूते मी मशक | काय देऊ || १०८ ||

नाही तुम्हा जरी | श्रीमंत नरहरी | लक्ष्मी तुझे घरी | नांदतसे || १०९ ||

याहोनी आम्हासी | तू काय मागसी | सांग हृषिकेशी | काय देऊ || ११० ||

मातेचे वोसंगी (=मांडीवर) | बैसोनिया बाळ वेगी | पसरी मुखसुरंगी | स्तनकांक्षेसी || १११ ||

बाळापासी माता | काय मागे ताता | ऐक श्रीगुरुनाथा | काय देऊ || ११२ ||

घेऊनिया देता | नाम नाही दाता | दयानिधि म्हणता | बोल दिसे || ११३ ||

देऊ न शकसी | म्हणे मी मानसी | चौदाही भुवनासी | तूचि दाता || ११४ ||

तुझे मनी पाही | वसे आणिक काही | सेवा केली नाही | म्हणोनिया || ११५ ||

सेवा घेवोनिया | देणे हे सामान्य | नाम नसे जाण | दातृत्वासी || ११६ ||

तळी बावी विहिरी | असती भूमीवरी | मेघ तो अंबरी | वर्षतसे || ११७ ||

मेघाची ही सेवा | न करिता स्वभावा | उदकपूर्ण सर्वा | केवी करी || ११८ ||

सेवा अपेक्षिता | बोल असे दाता | दयानिधि म्हणता | केवी साजे || ११९ ||

नेणे सेवा कैसी | स्थिर होय मानसी | माझे वंशोवंशी | तुझे दास || १२० ||

माझे पूर्वजवंशी | सेविले तुम्हांसी | संग्रह बहुवसी | तुझे चरणी || १२१ ||

बापाचे सेवेसी | पाळिती पुत्रासी | तेवी त्वा आम्हासी | प्रतिपाळावे || १२२ ||

माझे पूर्वधन | तुम्ही द्यावे ऋण | का बा नये करुणा | कृपासिंधु || १२३ ||

आमुचे आम्ही घेता | का बा नये चित्ता | मागेन मी सत्ता | घेईन आता || १२४ ||

आता मज जरी | न देसी नरहरी | जिंतोनि वेव्हारी | घेईन जाणा || १२५ ||

दिसतसे आता | कठिणता गुरुनाथा | दास मी अंकिता | सनातन || १२६ ||

आपुले समान | असेल कवण | तयासवे मन | कठिण कीजे || १२७ ||

कठीण की जे हरी | तुवा दैत्यांवरी | प्रह्लाद कैवारी | सेवकांसी || १२८ ||

सेवा बाळकासी | करू नये ऐसी | कठिणता परियेसी | बरवे न दिसे || १२९ ||

माझिया अपराधी | धरोनिया बुद्धि | अंत:करण क्रोधी | पहासी जरी || १३० ||

बाळक मातेसी | बोले निष्ठुरेसी | अज्ञाने मायेसी | मारी जरी || १३१ ||

माता त्या कुमारासी | कोप न धरी कैशी | आलिंगोनि हर्षी | संबोखी पा || १३२ ||

कवण्या अपराधेसी | न घालिसी आम्हासी | अहो हृषिकेशी | सांगा मज || १३३ ||

माता हो कोपासी | बोले बाळकासी | जावोनि पितयासी | सांगे बाळ || १३४ ||

माता कोपे जरी | एखादे अवसरी | पिता कृपा करी संबोखूनि || १३५ ||

तू माता तू पिता | कोपसी गुरुनाथा | सांगो कवणा आता | क्षमा करी || १३६ ||

तूचि स्वामी ऐसा | जगी झाला ठसा | दास तुझा भलतैसा | प्रतिपाळावा || १३७ ||

अनाथरक्षक | म्हणती तुज लोक | मी तुझा बाळक प्रतिपाळावे || १३८ ||

कृपाळु म्हणोनि | वानिती पुराणी | माझे बोल कानी | न घालिसीच || १३९ ||

नायकसी गुरुराणा | माझे करुणावचना | काय दुश्चितपणा | तुझा असे || १४० ||

माझे करुणावचन | न ऐकती तुझे कान | ऐकोनि पाषाण | विखुरतसे || १४१ ||

करुणा करी ऐसे | वानिती तुज पिसे | अजुनी तरी कैसे | कृपा न ये || १४२ ||

ऐसे नामांकित | विनविता त्वरित | कृपाळु श्रीगुरुनाथ | आले वेगी || १४३ ||

वत्सालागी धेनु | जैशी ये धावोनु | तैसे श्रीगुरु आपणु | आले जवळी || १४४ ||

येताचि गुरुमुनि | वंदी नामकरणी | मस्तक ठेवोनि | चरणयुग्मी || १४५ ||

केशव तो मोकळी | झाडी चरणधुळी | आनंदाश्रुजळी | अंघ्रि (= चरण, पाय) क्षाळी || १४६ ||

हृदयमंदिरात | बैसवोनि व्यक्त | पूजा उपचारित | षोडशविधि || १४७ ||

आनंदभरित | झाला नामांकित | हृदयी श्रीगुरुनाथ | स्थिरावला || १४८ ||

भक्तांच्या हृदयांत | राहे श्रीगुरुनाथ | संतोष बहुत | सरस्वतीसी || १४९ ||

|| इति श्रीगुरुचरित्रामृते परमकथाकल्पतरौ श्रीनृसिंहसरस्वत्युपाख्याने सिद्धनामधारकसंवादे मंगलाचरणं नाम प्रथमोSध्याय : ||

|| श्रीगुरुदत्तात्रेयार्पणमस्तु || श्रीगुरुदेवदत्त  ||

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