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कालिया मर्दन
कालिया मर्दन
भगवान श्रीकृष्ण और कालिया नाग की कथा श्रीमद्भागवतपुराण के दसवें स्कंध के सोलहवें अध्याय में कथन की है। यह कथा में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बचपन में की हुई प्रमुख लीला का वर्णन है, जो 'कालिया मर्दन' नाम से प्रसिद्ध हैं | यह कहानी संक्षिप्त रूप में इस तरह हैं-
उस समय भगवान श्रीकृष्ण छोटे थे और अपने बडे भाई बलराम के साथ पिता नंद बाबा और माता यशोदा मैया के साथ वृंदावन में रहते थे |
वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण अपने भाई और गोपालकों के साथ पशुओं को लेकर उन को चराते, गाते नाचते, बॉंसुरी बजाते अपना समय खुशी से बीताते थे |
वृंदावन के पास यमुना नदी का एक पोखर था | जब नदी का पानी किसी बडे गड्ढे में जम जाता है, तब उसे पोखर कहते हैं | यह पोखर इतना बडा़ था, कि उस में समुद्र की तरह पानी उफनता हुआ दिखता था |
एक दिन उस पोखर में कालिया नाम का एक नाग अपने परिवार के साथ रहने को आया | कालिया एक विषैला और पांच फन वाला नाग था | उस के मुॅंह से ज्वालाए निकलती थी | यमुना के पोखर में रहने से पहले वह रमणक द्वीप में रहता था । लेकिन नागों के शत्रु गरुड़ के डर से उसे वहां से भागना पड़ा। गरुड़ को वृंदावन में रहने वाले योगी सौभरि ने श्राप दिया था कि गरुड वृंदावन आयेंगे तो गरुड की मृत्यु हो जायेगी | यह जानकर कि यही एकमात्र स्थान है जहाँ गरुड़ नहीं आ सकते, कालिया ने वृंदावन में वास करने का निर्णय लिया।
एक दिन, भगवान श्रीकृष्ण और उनके बाल सखा यमुना नदी के किनारे खेल रहे थे। उस समय भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान यमुना नदी के पोखर पर गया | यमुना का पानी कालिया के विष के प्रभाव से एकदम काला हो गया था। किनारे पे जो पेड़ और लताए थी, वह भी कालिया के विष के प्रभाव से सूख गई थी | उस जगह पे कोई पशु या पक्षी जीवित नहीं रह सकता था |
भगवान श्रीकृष्ण ने सोचा कि उसे पोखर में उतर कर उस महासर्प के अभिमान को चूर करना होगा | उस से पोखर में पशुओं और लोगों के लिये पानी की सुविधा भी हो जाएगी | उस से और भी एक लाभ होता | कालिया के परिवार में और भी असंख्य सॉंप थे , जो वृंदावन में जहॉं तहॉं घूमा करते थे और उस प्रदेश को अपने अस्तित्व से भयंकर बनाते थे | यदि कालिया को मार दिया गया तो वे स्थल भी सुरक्षित हो जायेंगे |
यमुना नदी के किनारे एक कदंब वृक्ष था, जो अकेला जीवित था | उस का कारण यह कहा जाता है, कि जब गरुड अपनी मॉं की मुक्ति के लिये अमृत ले जा रहा था, तब अमृत की कुछ बूंदे गरुड ने भविष्य में भगवान श्रीकृष्ण की सहायता के लिये जान बूझकर गिरायी थी | कोई और लोग ऐसा भी कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण के पदस्पर्श से कदंब वृक्ष जीवित हो गया |
भगवान श्रीकृष्णने उस कदंब वृक्षपर चढकर पानी में कूदने का निश्चय किया | उस ने किसी से कुछ नहीं कहा | अपने बाल बाॅंध लिये | धोती कसकर बाॅंध ली | आपनी बॉंसुरी कमर में बॉंध दी | चप्पल उतार दी | अपने हाथ की रस्सी वगैरह दूर फेक दी | एक ही क्षण में भगवान श्रीकृष्ण कालिया को सबक सिखाने के लिए नदी में कूद पड़े |
भगवान श्रीकृष्ण के यमुना में कूदते ही ऐसी उथल पुथल आ गई मानो क्षीर सागर में मंदर पर्वत गिर पडा हो | वह उथल पुथल पाताल तक पहुॅंच गई |
यमुना के पानी में अचानक हुई यह उथल पुथल देखकर कालिया को बड़ा क्रोध आ गया | उस ने अपने काले और बड़े बड़े पॉंच फण खोले और भगवान श्रीकृष्ण पर हमला बोल दिया | फिर कालिया ने अपने विशाल शरीर से कृष्ण को पकड़ लिया,उस ने अपना मुख इस तरह से खोला ताकि उस के बड़े बड़े दॉंत दीखे | वह विषयुक्त ज्वालाए उगल रहा था | मुड़नेवाले अपने शरीर को उस ने फैला दिया |भगवान श्रीकृष्ण को उस ने जगह जगह काटा | उस के शरीर को लपेटकर वह दबाने लगा | यह देख कालिया के बन्धु, स्त्री, बच्चे, आदि महासर्पोंने भगवान श्रीकृष्ण को घेर लिया और लपटें उगलते उसे काटा | भगवान श्रीकृष्ण मूर्च्छित हो गये |
गोपकुमार, जो यह सब देखते थे, डर गये | वे भागे भागे वृंदावन गये और यशोदा मैया को ऑंखों देखा हाल बताया | यह सुनकर यशोदा मैया और नंद बाबा सब गॉंववालों के साथ यमुना की पोखर की ओर दौड पडे |
सब यमुना के किनारे, भगवान श्रीकृष्ण को देखकर पसीना पसीना हो गये | भगवान श्रीकृष्ण सॉंप के चुॅंगल में फॅंसकर बडे दयनीय स्थिती में थे | ऐसा लगता था, जैसे कोई कुछ भी न कर सकता हो | नंद बाबा और यशोदा मैया मूर्च्छित हो गये | बाकी लोगों ने उन पर पानी छिडक कर उन को होश में लाया |
सब दुःखी हो उठे | यह सोच कर कि यशोदा का पुत्र मर गया , हर किसी ने तरह तरह की बातें की,
'चलो हम सब पोखर में उतर कर उस सॉंप से युद्ध करे | आओ, कृष्ण को छुडाये | नहीं तो इस कालिया की विषाग्नी में हम भी मर जायेंगे | बिना कृष्ण के हम कैसे गॉंव जाये?'
बलराम सब देख रहा था और सब की बातें सुन रहा था | आखिर उस ने भगवान श्रीकृष्ण से यूॅं कहा, 'अरे कृष्ण, लोकहित की भावना भूलकर इस कम्बख्त साॅंप की चुॅंगल में आ फसे | देखा, हमारे सब लोग किस दयनीय स्थिति में हैं | इस ज़हरीले कीडे को मारकर हम सब को संतुष्ट करो |'
यह सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण होश में आ गये और तुरन्त सांप की चुॅंगल से निकल आये | उन्हों ने कालिया की पूंछ पकड़ी और कूदकर उसके फन पर जाकर खड़े रह गए। भगवान श्रीकृष्ण ने मानो पूरे ब्रह्मांड का भार अपने सर पर लिया था | वह कालिया के सभी सिरों को अपने पैरों से जोर जोर पीटने लगे ताकि उसके अंदर का सारा विष बाहर निकल जाए। भगवान श्रीकृष्ण अपने हाथ में बांसुरी लेकर कालिया के सिर पर नृत्य करने लगे। कालिया के सिर पर नृत्य करते हुए कृष्ण धीरे-धीरे यमुना के पानी की सतह पर आ गए।
वह कालिया की पूॅंछ हाथ में लेकर उस के सिर पर उछल कूद करने लगे | यमुना की लहरें मानो ताल दे रही हो | भगवान श्रीकृष्ण को सुरक्षित देखकर सारे गोकुलवासी खुशी से झूम उठे , गाने लगे | भगवान कृष्ण को कालिया के फणों पर नृत्य करते , आकाश में से देवताओं ने देखा |
फनों पर श्रीकृष्ण के लगातार वार से कालिया के मुंह से रक्त प्रवाह शुरू हो गया और वह धीरे-धीरे मरने लगा। लेकिन तभी कालिया की पत्नियां प्रकट हुईं और हाथ जोड़कर श्री कृष्ण से प्रार्थना करने और अपने पति के जीवन के लिए दया मांगने लगीं।
कालिया के सिर चूर हो गये | उस की नाकों से खून की धारा बहने लगी | उस के दॉंत टूट गये | लपटों के साथ उस के मुॅंह से विष निकला | वह कुॅंचल जाने पर कमल डॅंडी हा हो गया | मरने को ही था | तब उस ने दीन स्वर में कहा,' देव, यह बिना जाने कि तुम सर्वेश्वर हो, मैं ने अपने तुच्छ कोप में तुम्हारे शरीर पर प्रहार किया | तुम ने मुझे उचित दण्ड दिया | मुझ पर दया करो | मुझे क्षमा करो | मेरा विष चला गया | मेरी बुद्धि ठिकाने पे आ गई हैं | मैं तुम्हारा दास बनकर रहूॅंगा | जो तुम कहोगे वह करूंगा | तुम्हारे चरण छूकर मैं पवित्र हो गया हूॅं | तुम्हारा कोप मेरे लिये तुम्हारा अनुग्रह हैं |
भगवान श्रीकृष्ण को कालिया पर दया आ गई और उन्हों ने कहा ,' इस के आगे तुम यमुना नदी में नहीं रह सकते | तुम अपने लोगों को इकट्ठा करके समुद्र में चले जाओ | जब तुम्हारा विष चला जायेगा , तो नदी का पानी साफ हो जायेगा और लोगों के काम आयेगा | तुम्हारे सिर पर मेरे पैरों के चिह्न देखकर गरुड तुम्हारा कुछ नहीं बिगाडेगा | यही तुम्हे मेरा वर हैं | '
कालिया अपने परिवार को लेकर समुद्र की ओर निकल पड़ा | भगवान श्रीकृष्ण नदी में से किनारे पे आ गये | यशोदा मैया ने उसे गले लगाया | भगवान श्रीकृष्ण ने नंद बाबा को नमस्कार किया | नंद बाबा ने उसे आशिर्वाद दिया | गोप कुमारों ने भगवान श्रीकृष्ण को घेर दिया और उस की प्रशंसा करने लगे | उस पर आश्चर्य करने लगे | उस के बाद भगवान श्रीकृष्ण की प्रशंसा करते हुए सब वृंदावन लौट पड़े |
भगवान श्रीकृष्ण ने 'कालिया मर्दन' की इस कहानी को ऐसा वर दिया है कि जो कोई इस कहानी का पाठ या श्रवण करेगा उसे सॉंपों से भय नहीं रहेगा |
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