Saturday, July 13, 2024

मार्कंडेय ऋषि की कथा


मार्कंडेय ऋषि की कथा

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यह बहुत साल पुरानी कथा है | मृकंदु नाम के एक ऋषि थे | उन के पत्नी का नाम मरुदमति था | मृकंदु और मरुदमति दोनों वन में सादगी का जीवन जीते थे |

मृकंदु ऋषि और मरुदमति एक ही कमी महसूस करते थे | उन की कोई संतान नहीं थी | दोनों शिव के भक्त थे और नित्य भगवान शिव जी की उपासना करते थे |

उन की उपासना से  भगवान शिव जी प्रसन्न हुए | एक रात मृकंदु और मरुदमती,  दोनों ने एक ही सपना देखा | भगवान शिव जी ने उन्हें सपने में कहा कि वह दोनों की उपासना से प्रसन्न हैं और पूछा  कि वे क्या चाहते है | तब दोनों ने कहा कि वे संतान चाहते हैं |

इस बात पर भगवान शिव जी सोच में पड़ गये और उन्हें बताया कि उन के भाग्य में संतान नहीं हैं | परंतु भगवान शिव जी ने अपनी  कृपा से उन्हें दो विकल्प दिये | एक विकल्प था कि उन का पुत्र दीर्घायु परंतु बुद्धिहीन और उपद्रवी होगा | दूसरा विकल्प यह था कि उन का पुत्र बडा़ ज्ञानी होगा, परंतु उस की आयु केवल सोलह वर्ष की होगी |

इस बात पर दोनों ने तुरंत उत्तर दिया कि उन्हें ऐसा ही पुत्र चाहिये जो बडा़ ज्ञानी हो, भले उस की आयु कम क्यूं न हो | भगवान शिव जी 'तथाSस्तु ' कहकर अंतर्धान हुए |

मृकंदु ऋषि और  मरुदमति, दोनों की जब नींद खुल गई, तब उन्हों ने एक दूसरे को अपना सपना बताया | दोनों का एक ही सपना सुनकर वे चकित हो गये | मनोमन उन्हों ने भगवान शिवजी को धन्यवाद दिया |

भगवान शिव जी की कृपा से मरुदमति को पुत्र हुआ | उस पुत्र का नाम उन्हों ने मार्कंडेय रखा | मार्कंडेय बचपन से बहुत तेज़ दिमाग का था | उस की सब बहुत प्रशंसा करते थे | मृकंदु ऋषि और मरुदमति खुषी से पुत्र के साथ अपना समय बिताते थे | 

मार्कंडेय की आयु जब पंद्रह वर्ष की हुई तब उस की सोलह वर्ष की आयु के बारे में भगवान शिव जी ने जो भविष्यवाणी की थी वह याद करके मृकंदु ऋषि और मरुदमति बहुत दुखी हो गये | मार्कंडेय ने जब उस का कारण जाना, तब उस ने दोनों को आश्वस्त किया कि वे चिंता न करे | मार्कंडेय  फिर घर का त्याग करके भगवान शिवजी के मंदिर में बैठकर भगवान शिव जी की तपस्या करने लगे |

इस तरह से एक साल बीत गया और मार्कंडेय का प्राण   हरण करने के लिये भगवान यमराज आ गये | उन्हे देखकर मार्कंडेय शिवलिंग से लिपट गये | भगवान यमजी  ने अपना फंदा मार्कंडेय पर डाला | हालाकि मार्कंडेय शिवलिंग से लिपटे हुए थे, फंदे में शिवलिंग भी फस गया | इस से क्रोधित होकर  भगवान शिव जी प्रगट हुए और भगवान यमजी से युद्ध करने लगे | अंत में भगवान यम जी ने अपनी हार मान ली |   

तब भगवान यमजी ने भगवान शिव जी को प्रणाम करके   कहा कि वह भगवान शिव जी के ही नियम का पालन कर रहे हैं | भगवान शिव जी सोच में पड़ गये | आखिर उन्हों ने ऐसा निर्णय दिया कि मार्कंडेय की मृत्यु नहीं होगी , परंतु उस की आयु हमेशा के लिये सोलह वर्ष की ही रहेगी |

इस तरह भगवान शिव जी ने सृष्टि के नियम  का भंग भी नहीं किया और मार्कंडेय की तपस्या का भी सम्मान किया |

मार्कंडेय ऋषि ने जिस स्थान पर भगवान शिव जी की उपासना की वह स्थान वाराणसी में गोमति नदी के किनारे स्थित हैं और वहॉं पुराना मार्कंडेय मंदिर हैं |  ऐसा भी कहा जाता हैं कि उन्हों ने जहॉं तपस्या की थी वह स्थान केरल में त्रिप्रगोंड में हैं|

मार्कंडेय ऋषि ने मार्कंडेय पुराण की रचना की | इस पुराण में उन्हों ने बहुत सारी बातोंपर ज्ञान दिया हैं | मार्कंडेय ऋषि  की कथाऍं भागवत पुराण और महाभारत में भी हैं |

मार्कंडेय ऋषि की गणना आठ चिरंजीवों में होती हैं | आठ चिरंजीवों का प्रात:स्मरण करने से मनुष्य व्याधिमुक्त होता हैं और उसे दीर्घ आयु की प्राप्ति होती हैं |

मार्कंडेय ऋषि ने भगवान शिवजी की उपासना करने के लिये महामृत्युंजय मंत्र की रचना की |  इसी मंत्र के जाप से भगवान शिवजी मार्कंडेय ऋषि पर प्रसन्न हुए और उन्हे चिरंजीव किया | महामृत्युंजय मंत्र का नित्य जाप करने से मनुष्य मृत्यु के भय से मुक्त होता हैं और भगवान शिव की कृपा उस पर नित्य बनी रहती हैं | महामृत्युंजय मंत्र यह हमें मार्कंडेय ऋषि की सब से बड़ी देन हैं |