गुरुचरित्र
अध्याय ३ - अंबरीषव्रतनिरूपण
(ओवीसंख्या ८३)
अंबरीष राजाची कथा
श्रीगणेशाय नमः: ||
येणेपरी सिद्ध मुनि | सांगता झाला विस्तारोनि | संतोषोनि नामकरणी | विनवितसे मागुती || १ ||
तुझेनि सर्वस्व लाधलो | आनंदजळी बुडालो | परम तत्त्व जोडलो | आजिचेनि दातारा || ३ ||
ऐसे श्रीगुरुमहिमान | मज निरोपिले त्वां ज्ञान | आनंदमय माझे मन | तुझेनि धर्मे स्वामिया || ३ ||
कवणे ठायी तुमचा वास | नित्य तुम्हा कोठे ग्रास | होईन तुझा आता दास | म्हणोनि चरणी लागला || ५ ||
कृपानिधी सिद्ध मुनी | तया शिष्या आलिंगोनि | आशीर्वचन देऊनि | सांगे आपुला वृत्तांत || ६ ||जे जे स्थानी होते गुरू | तेथे असतो चमत्कारू | पुससी जरी आम्हां आहारू | गुरुस्मरणी नित्य जाणा || ७ ||
गुरुचरित्राचा महिमा:
श्रीगुरुचरित्र महिमान | तेचि आम्हा अमृतपान | सदा सेवितो याचे गुण | म्हणोनि पुस्तक दाविले || ८ ||
भक्ति मुक्ति परमार्थ | जे जे वांछिजे मनांत | ते ते साध्य होय त्वरित | गुरुचरित्र ऐकता || ९ ||
धनार्थी यासी अक्षय धन | पुत्रपौत्रादि गोधन | कथा ऐकता होय जाण | ज्ञानसिद्धी तात्काळ || १० ||
जे भक्तीने सप्तक एक | पढती ऐकती भक्तलोक | काम्य होय तात्कालिक | निपुत्रिका पुत्र होती || ११ ||
गृहरोगादिपीडन | न होती व्याधि कधी जाण | जरी मनुष्यास असेल बंधन | त्वरित सुटे ऐकता || १२ ||
ज्ञानवंत शतायुषी | ऐकता होय भरवसी | ब्रह्महत्यापापे नाशी | एकचित्ते ऐकता || १३ ||
इतके ऐकोनि त्या अवसरी | नामधारक नमस्कारी | स्वामी माते तारी तारी | कृपानिधि सिद्ध मुनी || १४ ||
साक्षात्कारे गुरुमूर्ति | भेटलासी तू जगज्योती | होती वासना माझे चित्ती | गुरुचरित्र ऐकावे || १५ ||
एखादा तृषेने पीडित | जात असता मार्गस्थ | त्या आणूनि देती अमृत | तयापरी तू मज भेटलासी || १६ ||
गुरूचा महिमा ऐको कानी | सांगिजे स्वामी विस्तारोनि | अंधकार असतां रजनी | सूर्योदयापरी करी || १७ ||
इतुकिया अवसरी | सिद्ध योगी अभय करी | धरोनिया सव्य करी | घेवोनि गेला स्वस्थाना || १८ ||
असे ठाव ज्ञानपंथी | कल्पवृक्षी अश्वत्थी | बैसोनि सांगे ज्ञानज्योती | एक शिष्या नामधारका || १९ ||
नेणती सोय गुरुदास्यका | याचि कारणे उपबाधका | होती तुज अनेका | चिंता क्लेश घडती तुज || २० ||
ओळखावया गुरुमूर्तीसी | आपुला आचार परियेसी | दृढ भक्ति धरोनि मानसी | ओळखिजे मग श्रीगुरु || २२ ||
ऐकोनि सिद्धांचे वचन | संतोषे नामधारक सगुण | क्षणक्षणा करी नमन | करुणावचने करोनिया || २२ ||
तापत्रयाग्नीत पोळलो | मी संसारसागरी बुडालो | क्रोधादि जलचरी वेष्टलो | अज्ञानजाळे वेष्टूनिया || २३ ||
ज्ञाननौकी बसवूनि | कृपेचा वायू पालाणुनि | देहा तारक करूनि | तारावे माते स्वामिया || २४ ||
ऐशिया करुणावचनी | विनवितसे नामकरणी | मस्तक सिद्धाचिया चरणी | ठेविता झाला पुन: पुन: || २५ ||
तव बोलिला सिद्ध मुनि | न धरी चिंता अंत:करणी | उठवीतसे आश्वासोनि | सांकडे फेडीन तुझे आता || २६ ||
ज्यांसी नाही दृढ भक्ति | सदा दैन्ये कष्टती | श्रीगुरूवरी बोल ठेविती | अविद्यामाये वेष्टूनि || २७ ||
संशय धरोनि मानसी | श्रीगुरू काय देईल म्हणसी | तेणे गुणे हा भोग भोगिसी | नाना कष्टे व्याकुळित || २८ ||
सांडोनि संशय निर्धार | गुरुमूर्ति देईल अपार | असा देव कृपासागर | तुज नुपेक्षी सर्वथा || २९ ||
गुरुमूर्ति कृपासिंधु | प्रख्यात असे वेदा बोधु | तुझे अंत:करणी वेधु | असे तया चरणांवरी || ३० ||
तो दातार अखिल मही | जैसा मेघाचा गुण पाही | पर्जन्य पडतो सर्वां ठायी | कृपासिंधु ऐसा असे || ३१ ||
त्यांतचि पात्रानुसार | सांगेन साक्षी एक थोर | सखोल भूमि उदक स्थिर | उन्नती उदक नाही जाण || ३२ ||
दृढ भक्ति जाणा सखोल भूमि | दांभिक ओळखा उन्नत तुम्ही | याचिया कारणे मनोकर्मी | निश्चयावे श्रीगुरुसी || ३३ ||
म्हणोनि श्रीगुरुउपमा | ऐसा कणव असे महिमा | प्रपंच होय परब्रह्मा | हस्त मस्तकी ठेवोनिया || ३४ ||
कल्पतरूची द्यावी उपमा | कल्पिले लाभे त्यांचा महिमा | न कल्पिता पुरवी कामा | कामधेनु श्रीगुरु || ३५ ||
ऐसा श्रीगुरु ब्रह्ममूर्ति | ख्याति असे श्रुतिस्मृती | संदेह सांडूनि एकचित्ती | ध्याय पदांबुज श्रीगुरूचे || ३६ ||
इतके परिसोनि नामधारक | नमन करोनि क्षणैक | करसंपुट जोडोनि एक | विनवितसे सिद्धासी || ३७ ||
श्रीगुरू सिद्ध योगेश्वरा | कामधेनु कृपासागरा | विनवितसे अवधारा | सेवक तुमचा स्वामिया || ३८ ||
स्वामींनी निरोपिले सकळ | झाले माझे मन निर्मळ | वेध लागला असे केवळ | चरित्र श्रीगुरूचे ऐकावया || ३९ ||
गुरू त्रयमूर्ति ऐको कानी | का अवतरले मनुष्ययोनी | सर्व सांगावे विस्तारोनि | म्हणोनि चरणी लागला || ४१ ||
मग काय बोले योगींद्र | बा रे शिष्या तू पूर्णचंद्र | माझा बोधसमुद्र | कैसा तुवा उत्साहविला || ४२ ||
तूते महासुख लाधले | गुरुदास्यत्व फळले | परब्रह्म अनुभवले | आजिचेनि तुज आता || ४२ ||
हिंडत आलो सकळ क्षिती | कवणा नव्हे ऐंशी मति | गुरुचरित्र न पुसती | तूते देखिले आजि आम्ही || ४३ ||
ज्यासी इहपरत्रींची चाड | त्यासी ही कथा असे गोड | त्रिकरणे करोनिया दृढ | एकचित्ते ऐकिलें || ४४ ||
तू भक्त केवळ श्रीगुरुचा | म्हणोनि भक्ति झाली उंचा | निश्चयो मानी माझिया वाचा | लाधसी चारी पुरुषार्थ || ४६ ||
धनधान्यादि संपत्ति | पुत्रपौत्र श्रुतिस्मृति | इह सौख्य आयुष्यगति | अंती गति असे जाणा || ४६ ||
गुरुचरित्र कामधेनु | वेदशास्त्रसंमत जाणु | अवतरला त्रयमूर्ति आपणु | धरोनि नरवेष कलियुगी || ४७ ||
कार्याकारण अवतार | होऊनि येती हरिहर | उतरावया भूमिभार | भक्तजनाते तारावया || ४८ ||
ऐकोनि सिद्धाचे वचना | प्रश्न करी शिष्यराणा | त्रयमूर्ति अवतार किंकारणा | देह धरोनि मानुषी || ४९ ||
विस्तारोनि ते आम्हासी | सांगा स्वामी कृपेसी | म्हणोनि लागला चरणासी | करुणावचने करोनिया || ५० ||
ब्रह्मयाचा रजोगुण | सत्त्वगुण विष्णु जाण | तमोगुण उमारमण | मूर्ति एकचि अवधारा || ५२ ||
ब्रह्मा सृष्टिरचनेसी | पोषक विष्णु परियेसी | रुद्रमूर्ति प्रळयासी | त्रयमूर्तीचे तीन गुण || ५३ ||
एका वेगळे एक न होती | कार्याकारण अवतार होती | भूमीचा भार फेडती | प्रख्यात असे पुराणी || ५४ ||
अंबरीष राजाची कथा:
सांगेन साक्ष आता तुज | अंबरीष म्हणिजे द्विज | एकादशीव्रताचिया काज | विष्णूसी अवतार करविले || ५५ ||
अवतार व्हावया कारण | सांगेन तुज विस्तारून | मन करोनि सावधान | एकचित्ते परियेसा || ५६ ||
द्विज करी एकादशीव्रत | पूजा करी अभ्यागत | निश्चयो करी दृढचित्त | हरिचिंतन सर्वकाळ || ५७ ||
असो त्याचिया व्रतासी | भंग करावया आला ऋषि | अतिथि होऊनि हठेसी | पावला मुनि दुर्वास || ५८ ||
ते दिवशी साधनद्वादशी घडी एक | आला अतिथि कारणिक | अंबरीषास पडला धाक | केवी घडे म्हणोनिया || ५९ ||
ऋषि आले देखोनि | अंबरीषाने अभिवंदोनि | अर्घ्य पाद्य देवोनि | पूजा केली उपचारे || ६० ||
विनवीतसे ऋषीश्वरासी | शीघ्र जावे स्नानासी | साधन आहे घटिका द्वादशी | यावे अनुष्ठान सारोनिया || ६१ ||
ऋषि जाऊनि नदीसी | अनुष्ठान करती विधींसी | विलंब लागता तयासी | आली साधन घटिका || ६२ ||
व्रत भंग होईल म्हणोनि | पारणे केले तीर्थ घेऊनि | नाना प्रकार पक्वान्नी | पाक केला ऋषीते || ६३ ||
तव आले दुर्वास देखा | पाहूनि अंबरीषाच्या मुखा | म्हणे भोजन केलेसि का | अतिथीविण दुरात्मया || ६४ ||
शाप देता ऋषीश्वर | राजे स्मरला शार्ङ्गधर | करावया भक्ताचा कैवार | टाकून आला वैकुंठा || ६५ ||
भक्तवत्सल नारायण | शरणागताचे रक्षण | बिरुद बोलती पुराणे जाण | धावे धेनु वत्सासी जैसी || ६६ ||
शापिले ऋषीने द्विजासी | जन्मावे गा अखिल योनीसी | तव पावला हृषीकेशी | येऊनि जवळी उभा ठेला || ६७ ||
मिथ्या नव्हे ऋषीचे वचन | द्विजे धरिले श्रीविष्णुचे चरण | भक्तवत्सल ब्रीद जाण | तया महाविष्णुचे || ६८ ||
विष्णु म्हणे दुर्वासासी | तुवा शापिले अंबरीषासी | राखीन आपुल्या दासासी | शाप आम्हासी तुम्ही द्यावा || ६९ ||
दुर्वास ज्ञानी ऋषीश्वर | केवळ ईश्वर अवतार | फेडावयास भूमिभार | कारण असे पुढे म्हणतसे || ७० ||
जाणोनि ज्ञानीशिरोमणी | म्हणे तप करिता युगे क्षोणी (= पृथ्वी) | भेटी नव्हे हरिचरणी | भूमीवरी दुर्लभ || ७१||
शापसंबंधे अवतरोनि | येईल लक्ष्मी घेऊनि | तारावयालागोनी | भक्तजना समस्ता || ७२ ||
परोपकारसंबंधेसी | शाप द्यावा विष्णुसी | भूमिभार फेडावयासी | कारण असे म्हणोनिया || ७३ ||
ऐसे विचारोनि मानसी | दुर्वास म्हणे विष्णूसी | अवतरोनी भूमीसी | नाना स्थानी जन्मावे || ७४ ||
प्रसिद्ध होसी वेळ दहा | उपर अवतार पूर्ण दहा | सहज तू विश्वात्मा महा | स्थूळसूक्ष्मी वससी तू || ७५ ||
ऐसा कार्यकारण शाप | अंगिकारी जगाचा बाप | दुष्टांवरी असे कोप | सृष्टिप्रतिपाळ करावया || ७६ ||
ऐसे दहा अवतार झाले | असे तुवा कर्णी ऐकिले | महाभागवती विस्तारिले || ७७ ||
कार्यकारण अवतार होती | क्वचित्प्रकट क्वचित गुप्ती | ते ब्रह्मज्ञानी जाणती | मूढमति काय जाणे || ७८ ||
आणीक सांगेन तुज | विनोद झालासे सहज | अनसूया अत्रिऋषीची भाज (= शोभा/गौरव) | पतिव्रताशिरोमणी || ७९ ||
तिचे गृही जन्म जाहले | त्रयमूर्ति अवतरले | कपटवेष धरोनि आले | पुत्र जाहले तियेचे || ८० ||
नायधारक पुसे सिद्धासी | विनोदकथा निरोपिलीसी | देव अतिप्रकट वेषी | पुत्र जाहले कवणे परी || ८१ ||
अत्रि ऋषि पूर्वी कवण | कवणापासूनि उत्पन्न | मूळ पुरुष होता कवण | विस्तारोनि मज सांगावे || ८२ ||
म्हणे सरस्वती गंगाधर | पुढील कथेचा विस्तार | ऐकता होय मनोहर | सकलांभीष्टे साधती || ८३ ||
इति श्रीगुरुचरित्रपरमकथाकल्पतरो श्रीनृसिंहसरस्वत्युपाख्याने सिद्धनामधारकसंवादे अंबरीषव्रतनिरूपणं नाम तृतीयोSध्याय :
(ओवीसंख्या ८३)
॥ श्रीगुरुदत्तात्रेयार्पणमस्तु ॥
टिपणे:
एकादशीव्रत: एकादशीच्या उपवासाचे पारणे द्वादशीला फेडणे आवश्यक आहे. अन्नग्रहण करून किंवा नुसते जलग्रहण करून हे पारणे फेडता येते. व्रत करण्याबरोबरच त्याची योग्य प्रकारे पूर्तता करणेही आवश्यक असते. अन्नग्रहण केल्यास अतिथीच्या आधी भोजन केल्याचा दोष लागेल, म्हणून अंबरीष राजाने केवळ जलग्रहण केले. परंतु दुर्वास ऋषींचा उद्देश अंबरीष राजाला त्रास देणे असल्याने त्यांनी अतिथीचा अनादर केल्याबद्दल अंबरीष राजाला शाप दिला.