Monday, November 18, 2024

३० दिन में चिंता से मुक्ति पाइये

३० दिन में चिंता से मुक्ति पाइये

आज हम सभी तरह-तरह की चिंता से ग्रस्त हैं।  कोई नहीं जानता कि इस चिंता को कैसे दूर किया जाए।  ऐसे समय में बेव एज़बेट द्वारा लिखित पुस्तक 'थर्टी डेज़ थर्टी वेज़ टू रिड्यूस एंग्जाइटी' आपकी मदद करेगी।

यह पुस्तक 30 दिन या एक महीने का कार्यक्रम है।  प्रत्येक दिन के लिए एक योजना दी गई है।  आप को बस दैनिक निर्देशों का पूरे मन से पालन करना है।  30 दिन बाद आपको फर्क जरूर महसूस होगा।  अब आइए देखें कि 30 दिनों में चिंता को कैसे हराया जाए।

दिन 1 🌅 

आज आप बहुत चिंतित महसूस कर रहे हो,  इसका मतलब यह नहीं है कि आपको काही  फ्रैक्चर हुआ है या आप को कोई सज़ा हुई है।

चिंता क्या है?  यह एक सामान्य बात है।  सफल लोग भी चिंता से ग्रस्त होते हैं। आप चिंता से पीड़ित हैं इस कारण घबराने की ज़रूरत नहीं।

 दिन 2 🌅 


यदि आप चिंता से पीड़ित हैं, तो इसे ऐसे समझें जैसे आपके घर में कोई अनचाहा मेहमान आया है।  तो फिर क्या करें, इस मेहमान को घर में एक अलग कमरा दे दें और कहें, 'यह आपका कमरा है।'  यहां बैठो और जो चाहो करो.  मेरे काम में विघ्न मत डालो।'

दिन 3 🌅 

यदि आप किसी चीज़ का विरोध करने की कोशिश करते हैं, तो वह चीज़ मजबूत और अधिक कष्टप्रद हो जाती है।  इसलिए चिंता का विरोध करने के बजाय, अपने दिमाग को दूसरी ओर मोड़ें।   पढ़ें, फ़िल्म देखें, कुछ दिलचस्प खोजें।

दिन 4 🌅 

यदि आपके पास करने के लिए बहुत सारा काम है तो आप चिंतित महसूस करते हैं।   काम के पहाड़ को रातों-रात निपटाने की कोशिश न करें।  अपने कार्यों की एक सूची बनाएं और उन्हें चरण दर चरण पूरा करते रहें।  जैसे-जैसे कार्य पूरे होंगे, आपकी चिंता कम होगी।

दिन 5 🌅 

अपनी चिंताओं को पराये व्यक्ति की नज़र से देखें।  मान लीजिए कि कोई एलियन किसी विदेशी ग्रह से आया है और आपकी चिंता उसके लिए एक केस स्टडी है।  वह आपकी चिंता पर एक रिपोर्ट बनाकर अपने प्रधान कार्यालय को भेजना चाहता है।  इस एलियन को वह जानकारी दे जो उसे चाहिए।  आप अपनी चिंता और उस पर काबू पाने के बारे में बहुत कुछ सीखेंगे।

दिन 6 🌅 

आपने सुना होगा कि आपका दिमाग एक शरारती बंदर या 'माइंड मंकी' है।  इस दिमागी बंदर को वश में करने के लिए यौगिक ध्यानसाधना का उपयोग किया जा सकता है।

दिन 7 🌅 

आपका अतीत आपको सताता रहता है।   यदि आप अतीत के बारे में सोचने के बजाय वर्तमान स्थिति में आपके आसपास क्या हो रहा है, इसके बारे में सोचने की आदत बना लें, तो आप अतीत से बाहर आकर वर्तमान में जी सकेंगे।

दिन 8 🌅 

इस दिन अपने आप से दया का व्यवहार करें।  अपने उपर गुस्सा न करे से, खुद के प्रति क्रूर होना बंद करें, खुद को 'इमोशन डिटॉक्स' उपचार दें।

दिन 9 🌅 

आप खुद को कोई बंधनों में जखड़ते रहते हैं | जैसे कि 'एक निश्चित कार्य अवश्य होना चाहिए, दुसरा कोई कार्य निपटाना बहुत ज़रूरी हैं'।'  आपको सबकुछ करने या न करने की आजादी है.  इसलिए ऐसे बंधनकिरक विचार और ऐसी भाषा बंद करें। 

दिन 10 🌅 

आप जो कुछ भी देखते हैं वह वैसा ही है।  यदि आप किस चीज़ के बारे में अच्छा सोचते हैं तो वह चीज़  आप को अच्छी दिखती हैं | यदि आप उस चीज़ के बारे में बुरा सोचते हैं तो वह चीज़  आप को  बुरी  दिखती है।  इसलिए अपने नकारात्मक विचारों और नकारात्मक भाषा को बदलें और सब कुछ आपको अच्छा लगेगा।

दिन 11 🌅 

कुछ मान्यताएँ तथ्य नहीं हैं, लेकिन आप आश्वस्त हैं कि वे तथ्य हैं।  धारणाओं की सुंदरता यह है कि जब ये धारणाएँ बदलती हैं, तो आपका अनुभव भी बदलता है।  ऐसी कुछ मान्यताओं की सूची बनाइये।  देखिए, विचार कीजिए कि ये मान्यताएं हैं या तथ्य।  यदि ये मान्यताएँ असत्य हैं, तो उन्हें बदल दें और आपका अनुभव बदल जाएगा।

दिन 12 🌅 

क्या आप लगातार सोचते रहते हैं कि 'अगर कुछ हुआ तो क्या होगा' या 'अगर कुछ नहीं हुआ तो क्या होगा?'  ऐसी बातें लिखो.  अब उनके उत्तर लिखिए.  आप देखेंगे कि इनमें से कई चीजें घटित नहीं होती हैं।  लेकिन आप बिना वजह चिंता कर रहे हैं.

दिन 13 🌅 

याद रखें जब आपके सामने कोई समस्या आती है तो वह एक कठिन कार्य है, विनाश नहीं।  किसी भी काम को पूरा करने का एक तरीका होता है।  कार्य के पहले चरण को 'प्रारंभ' के रूप में लिखें और जो परिणाम आप चाहते हैं उसे 'अंत' के रूप में लिखें।  अब सीढ़ी पर चढ़ने की तरह बीच के चरणों को शुरू से अंत तक भरें।  यही है समस्या का समाधान !

देखें कि आपका दृष्टिकोण कैसे उज्ज्वल होता है। यदि नहीं, तो साधारण चीजों का आनंद लें।  टहलने जाएं, झपकी लें।

दिन 14 🌅 

आज आप को चित्रकार बनना  हैं।  यह 'आर्ट थेरेपी' है। एक साधारण नोटबुक और ज़्यादा महंगी नही ऐसी रंग सामग्री काफी है।  एक बच्चा इस बात की परवाह नहीं करता कि तस्वीर कैसी दिख रही है, किसे पसंद है, बल्कि वह अपनी भावनाओं को कागज पर उतार देता है।  एक बच्चे की तरह चित्र बनाएं.

दिन 15 🌅 

क्या आप जानते हैं कि आपके अंदर एक बालक हैं |  तुमने इस बालक को अब तक कैद में रखा है।  आपको एक जिम्मेदार माता-पिता बनकर इस बालक को बचाना होगा।  याद रखें कि आप बचपन में कितने मासूम, खुले विचारों वाले, चंचल थे और अपने भीतर के बालक से मिलें।

दिन 16 🌅 

जब आप अपने भीतर के बालक से मिलेंगे तो आपकी क्या प्रतिक्रिया होगी?  यह मिली-जुली प्रतिक्रिया होगी.  शायद रो भी दें.  लेकिन बुरा ना माने।  वह भी स्वाभाविक है.  इस छोटे बालक के संपर्क में रहें, उसके लिए समय निकालें, वो चीज़ें करें जो आपको बचपन में पसंद थीं। 

दिन 17 🌅 

अपने भीतर के बालक से संपर्क करें।  लेकिन इससे उसे यकीन नहीं होगा.   इस छोटे से बालक को विश्वास दिलाओ कि,' मैं तुम्हारे साथ हूं।  मैंने अब तक तुम्हें नजरअंदाज किया है.  लेकिन अब मैं अपने व्यस्त कार्यक्रम से आपके लिए समय निकालूंगा।'

दिन 18 🌅 

आपके और आपके अंदर बसे हुए बालक के लिये आज का दिन एक मज़ेदार दिन है।  अपनी कल्पना से कोई खुशी के मौके ढूंढ लो और उन का  आनंद लो।  यदि आप छुट्टी ले सकते हैं, तो छुट्टी लें।  सुबह उठो.  बढ़िया नाश्ता करें.  संगीत वाद्य बजाएं।  आइसक्रीम पार्लर जाएं और आइसक्रीम खाएं।  आज आपका दिन है.

दिन 19 🌅 

आज का दिन आभार व्यक्त करने का, धन्यवाद देने का है।  आप कहते हैं, मेरी जिंदगी में कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है.  मुझे क्या और किसे धन्यवाद देना चाहिए?  आप ऐसा कैसे कहते हैं?  अब आराम से बैठ कर किताब पढ़ रहा हो,  इसका मतलब है कि आप एक किताब खरीद सकते हैं।  सच है या नहीं?  आइए और याद करे, कई अच्छी बातें याद आयेगी.

दिन 20 🌅 

क्या आप जीवन को बहुत गंभीरता से लेते हैं?  तो आज खूब हंसिए.  ये है 'लाफ्टर थेरेपी'.  किसी को एक चुटकुला बताओ.  कॉमेडी फिल्में देखें.

दिन 21 🌅 

आप जो खाते हैं उसका आपकी भावनाओं पर बहुत प्रभाव पड़ता है और इनमें से सबसे खराब है चीनी, जो आपके स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक है।   अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दें.  अपने आहार में साबुत अनाज, ताज़ी सब्जियाँ, फल, प्रोटीन शामिल करें।  खूब सारा पानी पीओ।

दिन 22 🌅 

अब आपको दो अक्षर के शब्द का महत्व समझना होगा और वह शब्द है - 'नहीं'.  क्योंकि अगर आप 'ना' कहना चाहते हुए भी ना नहीं कह पाते तो लोग आपकी बात मान लेते हैं और फिर अनचाहे काम आप के गेले में पड़ते हैं हरकतें  और इस से आपकी चिंता बढ़ जाती है।

दिन 23 🌅 

क्या आप हर किसी को खुश करने की कोशिश करते हैं?  अगर आप ऐसा करते हैं तो इस आदत को छोड़ दें।  ऐसा इसलिए है क्योंकि आप दूसरों के काम में इतने व्यस्त हैं कि आपके पास अपने लिए पर्याप्त समय नहीं है।

दिन 24 🌅 

आप किस तरह की व्यक्ति हो यह समझने का एक अच्छा तरीका है |  आप  जिन लोगों के साथ जुड़ते हो वो लोग आप के सारे में बहुत कुछ बता सकते हैं |  इन लोगों का चेहरा एक दर्पण की तरह होता है जिसमें आप अपना चेहरा देख सकते हैं।  इस आईने में देखो और खुद को बदलते रहो।

दिन २५ 🌅 

आज आप 'सिंक्रोनिसिटी' नामक एक नई अवधारणा के बारे में जानने जा रहे हैं।  इस अवधारणा के जनक आधुनिक मनोविज्ञान के संस्थापक कार्ल जंग हैं।  इस अवधारणा के अनुसार, आप जो चाहते हैं उसकी वेव्ह लेंग्थ पर आप को होना चाहिए।  इसका मतलब है कि वह चीज़ आपकी ओर स्वतः ही आकर्षित हो जाती है।  'आज का दिन अच्छा रहने वाला है,' कहें तो आप का दिन अच्छा रहेगा। 

दिन 26 🌅 

क्या आपको लगता है कि अन्य लोग आपसे अधिक होशियार, बेहतर, अधिक बुद्धिमान हैं?  लेकिन सच्चाई ऐसी नहीं है.  आप भी उतने ही होशियार, अच्छे, बुद्धिमान हैं।  आपके जैसा कोई नहीं है.  तुम सिर्फ तुम हो.

दिन 27 🌅 

किसी और का एहसान निभाना हो या किसी दूसरे को नाराज न करना हो, इसलिए आप हर दिन अपने दिल के खिलाफ कुछ काम करते हैं, उन सभी चीजों को आज ही त्याग दें।  आज वो सभी काम करें जो आपको पसंद हैं.

दिन 28 🌅 

आपकी अंतरात्मा आपको कुछ बता रही है।   किसी समय आपने यह आवाज सुनना बंद कर दिया है।  आपका दिमाग आपको ज़्यादा सोचने पर मजबूर कर देता है और आपकी स्थिति गांठों में बंधी सुई चीज् की तरह हो जाती है।  कहीं दूर घूमने जाएं या बिना किसी खास जगह को ध्यान में रखे किसी दौरे पर निकल जाएं।  आपको अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनाई देने लगेगी।

दिन 29 🌅 

जब आप अपने आप को अतीत के दुखों और पीड़ाओं के बारे में बता रहे हैं, तो आप अपने आप को अपने अतीत के बारे में एक कहानी बता रहे हैं जो अब नहीं हो रही है।  वह आपके जीवन की कहानी का पहला मसौदा था, इसे फेंक दें और आज ही एक बेहतर कहानी लिखना शुरू करें।

दिन 30 🌅 

श्रद्धा को आम तौर पर धार्मिक विचार माना जाता है।  लेकिन आप उन चीज़ों में भी श्रद्धा रख सकते हैं जो धर्म से संबंधित नहीं हैं जैसे कि आपके प्रियजन, प्रेम की शक्ति, जीवन ।  तो थोड़ी श्रद्धा रखो.  प्रकृति पर श्रद्धा रखें.  प्रकृति में चाहे कितनी भी विपदा हो, प्रकृति स्वयं को बदल लेती है, संतुलन स्थापित कर लेती है।  लोगों की बुनियादी अच्छाई पर भरोसा रखें.  आप स्वयं एक अद्भुत, अद्भुत व्यक्ति हैं।  अपने पर श्रद्धा रखो।

समीक्षा 🔬:-

तो यह बेव एज़बेट द्वारा लिखित पुस्तक का संक्षिप्त परिचय है।  पुस्तक इतनी सरल भाषा में लिखी गई है कि इसमें छिपे महान सिद्धांतों पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता।  30 दिनों में चिंता से छुटकारा पाना हमें एक असंभव विचार लगता है। लेकिन इस पुस्तक के उपरोक्त सारांश से आपको एहसास होगा कि यह असंभव नहीं है।  आपको इसमें अपना दिल लगाना होगा और यह पुस्तक उसके लिए मार्गदर्शक है।  लेखिका द्वारा विभिन्न पुस्तकों से दिये गये उद्धरण उसके अध्ययन को दर्शाते हैं।  चूंकि लेखक एक अच्छे कार्टूनिस्ट हैं, इसलिए लेखक ने प्रत्येक अध्याय के विषय को दर्शाने के लिए उपयुक्त कार्टून बनाए हैं।  संक्षेप में, यह पुस्तक किसी संग्रह में रखने के लिए नहीं है, बल्कि पास में रखने और लगातार पढ़ने, क्रियान्वित करने के लिए है।  मैं इस पुस्तक को पूरे 5 सितारे देता हूँ।

किताब के बारे में:

Name of the book: 30 Days 30 Ways to overcome anxiety

Author: Bev Aisbett

Pages:206

Introduction

Chapters Day 1 to Day 30

Other books by Bev Aisbett

Published by Harper Collins Publishers

पुस्तक की रूपरेखा:-

 पुस्तक में 30 दिनों के लिए 30 अध्याय हैं।  अध्याय का  नाम एक संदेश है.   अध्याय की शुरुआत में एक विचारोत्तेजक कार्टून है.  फिर लेखक बहुत ही सरल भाषा में विषय पर चर्चा करता है।  इसके बाद लेखक इस दिन क्रियान्वित करने की क्रिया बताता है।  अंत में इस दिन के लिये मंत्र दिया गया है जिसे आप को आचरण में लांना हैं |

बेव एज़बेट पुस्तक के लेखक:-

बेव एज़बेट एक स्वतंत्र चित्रकार और कार्टूनिस्ट हैं।  1993 में, वह गंभीर चिंता और अवसाद से पीड़ित हो गए।  इससे उबरने के बाद उन्होंने अपनी मशहूर किताब लिविंग विद आईटी- ए सर्वाइवर्स गाइड टू पैनिक अटैक्स लिखी।  बेव ने कई किताबें लिखी हैं।  उनमें चिंता निवारण पर अधिक पुस्तकें शामिल हैं।

-Book review by Dr Hemant Junnarkar

© Dr Hemant Junnarkar, All rights reserved

अस्वीकरण:

यह बेन एज़बेट द्वारा लिखित पुस्तक 'थर्टी डेज़ थर्टी वेज़ टू रिड्यूस चिंता' की एक संक्षिप्त समीक्षा है।  यह सिर्फ एक समीक्षा है.   समीक्षक पुस्तक पर किसी भी प्रकार के कॉपीराइट का दावा नहीं करता है।   कॉपीराइट लेखक/प्रकाशक के पास रहता है।   पुस्तक में संदर्भ और इसकी सामग्री की चर्चा केवल शिक्षा और मनोरंजन के लिए है।




Friday, November 15, 2024

स्वकृतानि सुभाषितानि

 स्वकृतानि सुभाषितानि 

©डॉ. हेमंत जुन्नरकर



यावत् त्वं न गृह्णासि कस्यचिद्धनं  ऋणम्
तावत्तस्य खलु नास्ति तवालोचनकारणम्
अर्थ: जोपर्यंत तुम्ही कुणाचे धन किंवा कर्ज घेत नाही, तोपर्यंत त्याला तुमच्यावर टीका करण्याचे कारण नाही

Tuesday, November 12, 2024

ઓટીસ્ટીક બાલક ને શાળામાં સફળ બનાવો

ઓટીસ્ટીક બાલક ને શાળામાં કેવી રીતે સફળ બનાવશો

જો તમારો પુત્ર કે પુત્રી ઓટીસ્ટીક છે, તો તમારે ઘણી સમસ્યાઓનો સામનો કરવો પડશે.  આમાંથી એક સમસ્યા આ પુસ્તકમાં ધ્યાનમાં લેવામાં આવી છે.  તે સમસ્યા એ છે કે ઓટીસ્ટીક બાળકની પ્રાથમિક શાળાથી માધ્યમિક શાળા સુધીની સફળતા.  

૧. તમને ક્યાંય પરિપૂર્ણ શાળા મળશે નહીં

પ્રકરણ 1 માં લેખક ખૂબ જ શરૂઆતમાં સમજાવે છે કે તમને ક્યાંય પરિપૂર્ણ શાળા મળશે નહીં.  શાળામાં જોડાતા પહેલા, તમારે શાળાની વેબસાઈટનો અભ્યાસ કરીને, અન્ય માતા-પિતાઓ સાથે સલાહ લઈને તમારું હોમવર્ક કરવું જોઈએ.  શાળાની મુલાકાત લેવાનું વધુ સારું છે.   લેખક અહીં એક ટીપ આપે છે.  અગર સ્કૂલ માં જગ્યા જગ્યાએ ' આ કરવો નહિ, તે કરવું નિષિદ્ધ છે' આવા બોર્ડ હશે, તો તે શાળા તમારા બાળક માટે સારી શાળા ન હોવાની શક્યતા છે.   તમે શાળા માટે તમારી અપેક્ષાઓનો ચાર્ટ બનાવી શકો છો અને તમારું હોમવર્ક જેમ જેમ આગળ વધે તેમ તેને ભરી શકો છો.  આ બધું કરતી વખતે, તમારે તમારા બાળક સાથે ચર્ચા કરવાની જરૂર છે. 

૨. શાળા પ્રવેશ પહેલાં કરવાની તૈયારી:

ચાલો, તમારી શાળા નક્કી થઈ ગઈ છે.  પ્રકરણ 2 માં, પ્રવેશ પહેલાં કરવાની તૈયારીનો ઉલ્લેખ કરવામાં આવ્યો છે.  તૈયારી એ ચિંતા ઘટાડવાની ચાવી છે.   લેખકો 'ટિપ્સ ચાર્ટ' નામનો ચાર્ટ બનાવવાનું સૂચન કરે છે.  આ ચાર્ટમાં, બાળકને જે સમસ્યાઓનો સામનો કરવો પડી શકે છે અને તેના ઉકેલો શું લઈ શકાય તે નોંધવું જોઈએ.

૩. જમીનની તૈયારી

પ્રકરણ 3 'જમીનની તૈયારી' વિશે છે.   શારીરિક તૈયારી સાથે, તમારે તમારા બાળકને માનસિક રીતે પણ તૈયાર કરવું જોઈએ.  લેખકો બાળકને 'વિઝ્યુઅલ થર્મોમીટર' નામના ઉપકરણનો ઉપયોગ કરવાનું શીખવવાનું સૂચન કરે છે.  આ ઉપકરણ ટ્રાફિક લાઇટ જેવા લીલા, પીળા અને લાલ રંગોનો ઉપયોગ કરે છે.  તમે આ રંગોનો ઉપયોગ કરીને તમારા બાળકને તેની લાગણીઓ વ્યક્ત કરવાનું શીખવી શકો છો.

૪. શાળાની સાથે સહયોગ કરો:

તમારો પુત્ર જે શાળામાં જાય છે તેની સાથે તમે સહયોગ કરી રહ્યા છો.  પ્રકરણ 4 આવા સહયોગ માટે પાયો નાખવા વિશે છે.   આવા સહયોગ માટે, શાળા અને તમારી વચ્ચે માહિતીની નિયમિત આપ-લે થવી જોઈએ.  આનાથી બંને પક્ષો વચ્ચે વિશ્વાસનું વાતાવરણ ઊભું થશે અને ભવિષ્યમાં તકરાર ટાળી શકાશે.  આ માટે તમારી પ્રતિક્રિયા હકારાત્મક હોવી જોઈએ નકારાત્મક નહીં.  તમારી અને શાળા વચ્ચે સારી ભાગીદારીથી તમારા બાળકને ફાયદો થશે.

૫. તમારા બાળકની લાગણીનો વિસ્ફોટ માટે અગાઉથી તૈયારી કરો:
આ એક એવી ઘટના છે કે જ્યારે તેના બાળકની લાગણીઓ ફૂટી નીકળે અને તે રડવા લાગે અથવા તે ગુસ્સે થઈને બૂમો પાડે ત્યારે કોઈ પણ મા-બાપ સહન કરી શકતા નથી.  લેખકો જણાવે છે કે આવા રોગચાળો અચાનક થતો નથી, પરંતુ તે ઘણી નાની પ્રતિકૂળ ઘટનાઓની સંચિત અસર હોઈ શકે છે.  જો તમે બાળકના ભાવનાત્મક વિસ્ફોટને ઉત્તેજિત કરતી ઘટના વિશે જાણતા હોવ, તો શાળાને અગાઉથી જણાવો.   બાળકને એવી વસ્તુ આપો જે અન્ય લોકો માટે નજીવી લાગે પરંતુ બાળક માટે મહત્વપૂર્ણ હોય, જેમ કે રમકડું, ચાવીની સાંકળ અથવા બાળકની લાગણીના પ્રકોપને શાંત કરી શકે તેવી અન્ય કોઈ વસ્તુ.  કેટલીકવાર તે શાળાના નિયમો સાથે બંધબેસતું નથી.  પછી તમારે શાળાને સમજાવવી પડશે.

૬, ૭. અવરોધો પર વિજય:

જો કોઈ નવી પરિસ્થિતિનો સામનો કરવો પડે, તો આપણે આપણા અનુભવના બળથી આવી પરિસ્થિતિમાંથી બહાર નીકળી શકીએ છીએ.  આવા અનુભવનો અભાવ ઓટીસ્ટીક વ્યક્તિ માટે એક મોટો અવરોધ છે.  ઓટીસ્ટીક વ્યક્તિઓ જ્યારે નવી પરિસ્થિતિઓનો સામનો કરે છે ત્યારે તેઓ મૂંઝવણ અનુભવે છે.  લેખકો પ્રકરણ 6 અને 7 માં આવા અવરોધોને ધ્યાનમાં લે છે. 

લેખક જણાવે છે કે માતા-પિતાએ બાળકની તમામ સમસ્યાઓ જાતે ઉકેલવાને બદલે અવરોધોનો સામનો કરવા માટે તેમના બાળકને વિકસાવવા જોઈએ.

૮. સેચ્યુરેશન મોડેલ:

પ્રકરણ 8 સેચ્યુરેશન મોડેલની ચર્ચા કરે છે.    વિકલાંગતાનું મેડિકલ મોડેલ ધારે છે કે વિકલાંગ લોકો તેમની ક્ષતિઓ અથવા તફાવતોને કારણે અક્ષમ છે જ્યારે સેચ્યુરેશન મોડેલ ધારે છે કે વિકલાંગ લોકો અમુક સમાજ ના વિશિષ્ટ ધારણાઓને કારણે અક્ષમ છે.  સેચ્યુરેશન મોડેલ ઓટીસ્ટીક વ્યક્તિઓને સમાજમાં સમાન તરીકે કાર્ય કરવાની સંધી આપે છે.

૯. ગુંડાગીરી નો સામનો:

કેટલાક બાળકો છે જેઓ શાળામાં ગુંડાગીરી કરે છે.  પ્રકરણ 9 જો તમારા બાળકને આ વૃત્તિઓ ધરાવતાં બાળકો દ્વારા ગુંડાગીરી કરવામાં આવી રહી હોય તો શું કરવું તે જોવામાં આવ્યું છે.  જો કોઈ તમારા બાળકને ધમકાવતું હોય, તો બાળકના સંપર્કમાં રહો અને સમયસર શાળાને જાણ કરો.

૧૦. તમારા બાળક માટે મિત્રો બનાવો:

શાળામાં, બાળકોને મિત્રોની જરૂર હોય છે.   પ્રકરણ 10 માં, લેખક સૂચવે છે કે શાળાઓએ ક્લબની સ્થાપના કરવી જોઈએ અને બાળકો વચ્ચે મિત્રતા વિકસાવવા માટે વિવિધ ઉપક્રમો  કરવા જોઈએ.

૧૧, ૧૨: શાળા સાથે મતભેદ:

પ્રકરણ 11 અને 12 જો તમને શાળા સાથે મતભેદ હોય તો શું કરવું જોઈએ એ બતાવે છે.  આવી પરિસ્થિતિઓમાં લેખકો સંઘર્ષને બદલે સમન્વય પર ભાર મૂકે છે.  

તમારે નમ્રતાપૂર્વક પરંતુ નિશ્ચિતપણે તમારી ભૂમિકા શાળાને સમજાવવી જોઈએ.

૧૩. શાળા‌ ને અલવિદા:

પ્રકરણ 13 જણાવે છે કે જો તમે શાળા સાથે મેળ ખાતા નથી અને શાળાઓ બદલવાનો સમય આવે છે, તો તમારે તેના માટે તૈયારી કરવી જોઈએ અને શાળાને અલવિદા કહેતી વખતે કડવાશ ટાળવી જોઈએ અને સંબંધ ફરીથી સ્થાપિત કરવાની શક્યતા રાખવી જોઈએ.

૧૪. ઓટીસ્ટીક બાળકો માટે આદર્શ શાળા:


છેલ્લા ચૌદમા પ્રકરણમાં લેખક ઓટીસ્ટીક બાળકો માટે એક આદર્શ શાળાનો તેમનો વિચાર સમજાવે છે.  લેખકોના મતે આવી શાળામાં 'ટોપ ડાઉન કલ્ચર' હોવું જોઈએ.  તેનો અર્થ એ કે વરિષ્ઠ સ્તરે અનુભવી લોકોનું એક મેનેજમેન્ટ બોર્ડ હોવું જોઈએ અને તેમના દ્વારા લેવામાં આવેલા નિર્ણયો નીચેના સ્તરે લાગુ કરવા જોઈએ.  આવી શાળાનું સંચાલન લવચીક હોવું જોઈએ, એટલે કે પરિસ્થિતિ અનુસાર ફેરફાર કરવા સક્ષમ હોવું જોઈએ.  શાળામાં સાથી જૂથો માટે તાલીમ હોવી જોઈએ.  નિવારણ ઇલાજ કરતાં વધુ સારું છે એ સિદ્ધાંતને ધ્યાનમાં રાખીને, શાળા મેનેજમેન્ટે અપ્રિય ઘટનાને કેવી રીતે ટાળી શકાય તે વિશે વિચારવું જોઈએ.

સમીક્ષા: 🔬 

ગેરેથ ડી.  મોરવુડ અને ડેબી એલી દ્વારા પુસ્તક 'ચેમ્પિયનિંગ યોર ઓટીસ્ટીક ટીન એટ સેકન્ડરી સ્કૂલ-ગેટીંગ ધ બેસ્ટ ફ્રોમ મેઈનસ્ટ્રીમ સેટિંગ્સ' પુસ્તકની આ સંક્ષિપ્ત સમીક્ષા છે. 

આ પુસ્તક યુકેમાં શાળાની પરિસ્થિતિને ધ્યાનમાં રાખીને લખવામાં આવ્યું છે.   પરંતુ પુસ્તકમાં આપવામાં આવેલ માર્ગદર્શન શાળાની તમામ પરિસ્થિતિઓમાં લાગુ પડે છે.  વાસ્તવમાં પુસ્તકનો વિષય પ્રાથમિક શાળામાંથી માધ્યમિક શાળામાં સંક્રમણનો છે.  પરંતુ લેખકોએ આવો તફાવત ક્યાંય સમજાવ્યો નથી.  પુસ્તકમાં ચર્ચા શાળા પ્રવેશ વિશે છે.  મુદ્દો એ છે કે અહીં કોઈ તૈયાર ઉકેલની અપેક્ષા રાખી શકાતી નથી.   આ પુસ્તક શાળા જીવન અને ઓટીસ્ટીક બાળકના ઉછેર માટે સામાન્ય માર્ગદર્શક કહી શકાય.  આ પુસ્તકનું મારું રેટિંગ 'થ્રી સ્ટાર' છે.

પુસ્તક વિશે:

Championing your autistic teen at secondary school-getting the best from mainstream settings

by Debby Elley with Gareth D. Morewood

પુસ્તક ની રૂપરેખા:

આ પુસ્તક ચૌદ પ્રકરણોમાં વહેંચાયેલું છે.   આ ચૌદ પ્રકરણોમાં, લેખકો વિવિધ વિષયોની ચર્ચા કરે છે અને વાચકને કેવી રીતે પ્રાથમિક શાળામાંથી માધ્યમિક શાળાની સફળતામાં ઓટીસ્ટીક બાળક સંક્રમણ કરે છે તેના પર ઉપયોગી માહિતીનો ભંડાર આપે છે.

લેખક પરિચય:

આ પુસ્તકના લેખક, ગેરેથ ડી મોરવુડ, સ્ટુડિયો થ્રી માટે શૈક્ષણિક સલાહકાર છે.   તેણે અગાઉ 25 વર્ષ સુધી યુકેની શાળાઓમાં કામ કર્યું હતું. 

પુસ્તકના સહ-લેખક, ડેબી એલી, જોડિયા ઓટીસ્ટીક છોકરાઓની માતા છે.  આથી તેમના લખાણમાં સ્વાનુભવનું એક પાસું છે.  તેણી પ્રાદેશિક અખબારોમાં સબ-એડિટર રહી ચુકી છે, ત્યારબાદ 2008 થી 2021 સુધી ચાલતા Au-Kids મેગેઝિનની સહ-સ્થાપના કરી.   તે ફ્રીલાન્સ ટ્રેનર, લેખક અને સલાહકાર તરીકે કામ કરે છે.   તેમણે ઓટીઝમ પર ઘણા લેખો અને પુસ્તકો લખ્યા છે.

ડિસક્લેમર:

આ માત્ર એક સમીક્ષા છે.   સમીક્ષક પુસ્તક પર કોઈપણ પ્રકારના કોપીરાઈટનો દાવો કરતા નથી.   કોપીરાઈટ લેખક/પ્રકાશક પાસે રહે છે.   પુસ્તકના સંદર્ભો અને તેના વિષયવસ્તુની ચર્ચા માત્ર શિક્ષણ અને મનોરંજન માટે છે.

Book review by-

By Dr Hemant Junnarkar 

© Dr Hemant Junnarkar, All rights reserved

Monday, November 4, 2024

श्रीमद्भगवद्गीता-अध्याय २


श्रीमद्भगवद्गीता 

अध्याय २ - सांख्ययोग

संजय म्हणाला

करुणापूर्ण तशा अर्जुनाला | व्याकूळ, अश्रुपूर्ण दिसणाऱ्याला || 

विषाद करणाऱ्याला | मधुसूदन हे वाक्य बोलले || अ.२, ओ.१|

श्रीभगवान म्हणाले

कोठून हे तर्कट अर्जुना | 

अशा अवेळी आले तुझ्या मना || 

जे नेते दूर स्वर्गापासून, न शोभते आर्यांना | 

आहे अपकीर्तीचे कारण ||अ.२, श्लो.२||

नकोस पडू कमकुवतपणास बळी | तुला न हा शोभतो मुळी || 

मन:स्थिती क्षुद्र दुबळी | सोडून ऊठ परंतपा || अ.२, श्लो.३||

अर्जुन म्हणाला

कसा मी या युद्धात पण | पूज्य आम्हाला जे भीष्म-द्रोण || 

त्यांच्यावर उलट सोडू बाण | सांग मधुसूदना ||अ.१, ओ.४||

महान गुरूंस मारणे | यापेक्षा बरे, भीक मागून जगणे || 

जरी हे गुरू पैशासाठी ओशाळवाणे | हत्येचे भोग असतात रक्तरंजित ||अ. २, ओ. ५ ||

नकळे मला दोन्हींत बरे काय | मिळवावा की न मिळवावा जय || 

ज्यांना मारून जगण्यात न स्वारस्य | ते धार्तराष्ट्र युद्धास सिद्ध ||अ. २, ओ.६||

गोंधळली वृत्ती, झाले कुंठित मन |   धर्माविषयी मला न ज्ञान || 

भले काय ते सांग समजावून | शिष्य मी तुझा, सांग मला शरणागताला || अ.१, ओ.७||

कसे दूर करू, मला न कळते | दु:ख जे इंद्रियांचे शोषण करते || 

जरी निष्कंटक राज्य पृथ्वीचे मिळते | आणि देवांचे आधिपत्य ||अ. २, ओ.८||

संजय म्हणाला

बोलून असे हृषीकेशास | गुडाकेश, जो ताप देई शत्रूंस || 

'नाही करणार युद्धास'| असे बोलून शांत झाला ||अ.२, ओ.९||

हृषीकेश बोलला त्यास | भारता, करून जणू हास्यास || 

विषाद करणाऱ्या अर्जुनास | दोन्ही सैन्यांच्यामध्ये || अ.२, ओ.१०||

श्रीभगवान म्हणाले

ज्याचा शोक करू नये त्याचा शोक करतोस | पोकळ पांडित्य सांगतोस |I 

नसे दु:ख खऱ्या ज्ञानी लोकांस | आल्यागेल्यांचे  ||अ.२, ओ.११||

तुला, मला, या राजांस | वा आपणां सर्वांस || 

नव्हता जन्म पूर्वी, न यावयाचे जन्मास | असे काही नाही || अ. २, ओ. १२||

आत्म्यास या देहात जशा लाभती | 

बालपण, तारुण्य, म्हातारपण या स्थिती |I 

तशीच होते त्याला नव्या देहाची प्राप्ती | 

त्यामुळे ज्ञानी मोह न पावतो || अ. १, ओ. १३ ||

कौंतेया, स्पर्शसंवेदना उत्पन्न होती | 

शीत वा उष्ण, सुख वा दु:ख देती || 

त्या येती तशा जाती | 

कर सहन त्यांना || अ.१, ओ.१४||

या संवेदना व्यथा न देती ज्या ज्ञानी पुरुषाला | पुरुषश्रेष्ठा, सांगतो तुला || 

सुख आणि दु:ख सारखे ज्याला | तो अमृतत्वाला पात्र होतो ||अ.२, ओ. १५||

असत् होई न भाव | सत् होई न अभाव || 

असा या दोन्हींचा पाहिला ठाव | तत्त्वदर्शी लोकांनी ||अ.२, ओ.१६||

जाण अविनाशी अव्ययास | ज्याने व्यापिले या सर्वास || 

त्याच्या विनाशास | कोणीही समर्थ नाही || अ. २, ओ.१७||

नित्य, अविनाशी, अप्रमेय आत्म्याने या | धारण केलेल्या काया | 

अंती जाती विलया | त्याकरिता युद्ध कर || अ. २, ओ.१८||

जो मानतो मारणारा आत्म्यास | किंवा जो मानतो  मेलेला त्यास || 

कळत नाही त्या दोघांस | हा न मारतो न मारला जातो || अ. २, श्लो. १९||

आत्मा नाही जन्मत, नाही मरत | नाही तो झाला, नाही होत ||     

तो पुरातन, नित्य, शाश्वत, जन्मरहित | शरीर नष्ट करिता, नाही मारला जात || अ.२, श्लो. २० ||

ज्या पुरुषास ज्ञात | की आत्मा नित्य, अव्यय, जन्मरहित || 

तो पुरुष कसा करवील कुणाचा घात | किंवा मारील कुणास? || अ.२, श्लो. २१||

जसा मनुष्य जुनी वस्त्रे टाकून | 

नवी वस्त्रे करतो परिधान || 

तसा आत्मा जुनी शरीरे सोडून | 

नव्या शरीरात जातो || अ.२, श्लो. २२||

तुटे न हा शस्त्राने | जळे न हा अग्नीने || 

भिजे न हा पाण्याने | न सुकवी वारा यास || अ.२, ओ.२३||

न हा तोडला वा जाळला जातो | न भिजवला वा सुकवला जातो || 

नित्य, स्थिर, सर्वत्र राहतो | अचल हा सनातन || अ. २, ओ. २४||

हा अचिंत्य, अव्यक्त | अविकार्य यास बोलतात || 

हे झाल्यावर ज्ञात | शोक करणे योग्य नाही || अ. २, ओ.२५||

हा जन्मतो आणि मरतो नियमित | असे जरी असेल तुझे मत |I 

तरी शोक करणे न उचित | महाबाहो तुला ||अ. २, ओ. २६ ||

मृत्यू हा जन्माचा संपात | 

तसा जन्म हा मृत्यूचा संपात || 

याचे भान ठेवीत | 

योग्य नाही शोक करणे ||अ.२, श्लो. २७||

आरंभी ही भूते अव्यक्त असती | मध्ये व्यक्त दिसती || 

अखेर अव्यक्तातच विलीन होती | तिथे शोक कशासाठी || अ. २, श्लो. २८||

कुणी आत्म्यास आश्चर्यकारक म्हणून पाहती | कुणी आश्चर्यकारक बोलती || 

कुणी आश्चर्यकारक म्हणून ऐकती | आणि ऐकूनसुद्धा त्यास, जाणे न कुणीही || अ. २, ओ. २९ ||

भारता, आत्मा राहतो देहात | आत्मा आहे अवध्य, शाश्वत ||

तेव्हा सर्व भूतांप्रत | शोक करणे योग्य नाही || अ. २, ओ.३०||

आणि पाहताही स्वधर्मास | वाव नसे विचलित होण्यास |I 

कारण यु्द्धाहून क्षत्रियास | हितकारक काही नसे || अ. २,ओ. ३१||

काही सायासांवाचून | स्वर्गाचे दार ठेविले उघडून |I 

क्षत्रियांस भाग्यवान | युद्ध असे लाभते || अ.२, ओ.३२||

जाणूनही धर्मास | न करशील या युद्धास || 

पात्र होशील पापास | स्वधर्म आणि कीर्ती गमावून || अ. २, ओ. ३३ ||

अपकीर्ती तुझी करतील | जन हे सकल || 

संभावितास अपकीर्तीचा सल | मरणाहून असह्य || अ. २, ओ.३४||

महारथी म्हणतील, 'अर्जुन | पळाला  रणातून घाबरून ' |I 

करतील तुझे अवमूल्यन | जे तुला मानतात || अ.२, ओ.३५||

बोलू नये ते बोलतील | पुष्कळ तुझ्याबद्दल || 

तुझे सामर्थ्य कमी लेखतील | त्याहून काय दु:खदायक || अ.२, ओ.३६||

मारला गेल्यास मिळवशील स्वर्गास | जिंकल्यास भोगशील पृथ्वीस || 

म्हणून कौंतेया, ऊठ युद्धास  | दृढनिश्चय करूनी || अ.२ ओ. ३७||

समान मानून सुख-दु:खास | लाभ-हानी, जय-पराजयास || 

करशील जर युद्धास | लागणार नाही पाप तुला || अ.२, ओ.३८||

हे ज्ञान  सांगितले सांख्यातील | ऐक ज्ञान आता योगातील || 

जे जाणून मुक्त होशील | कर्मबंधातून || अ.२, ओ.३९||

योगात  आरंभिले कार्य नाश न पावते | न आरंभिल्या कार्यात विघ्न  येते || 

मोठ्या भयापासून रक्षण करते | या धर्माचे अल्प आचरण || अ.२, ओ.४०||

जी  व्यस्त  असे योगात  | एकत्व  राहे त्या बुद्धीत || 

जी नसे योगात  व्यस्त  | त्या बुद्धीला अनंत शाखा फुटती  || अ.२, ओ.४१||

अज्ञानी लोक भाषा फुलवती | आणि बोलती || 

वेदांच्या वादात रंगून म्हणती, | ‘नसे दुसरे काही’ || अ.२, ओ.४२||

‘विविध विशेष क्रियांचे  फळ म्हणून | भोग आणि ऐश्वर्य देणारा  जन्म येतो चालून’, || 

म्हणती हे जन | इच्छा आणि स्वर्गाच्या पाठी जे असती ||अ.२, ओ.४३||

भोग आणि ऐश्वर्य ध्येय एक | मानून गमावती विवेक || 

त्यांची बुद्धी व्यवसायात्मिक | होते न स्थिर || अ.२, ओ. ४४||

वेद आहेत त्रिगुणांनी युक्त | अर्जुना, तू हो त्रिगुणरहित || 

नेहमी सत्त्वगुणी, द्वंद्वापासून मुक्त | योगक्षेमापासून दूर, आत्मनिष्ठ || अ. २, ओ.४५||

जळाने व्यापता सर्व बाजूंस | 

कोण विचारी विहीरीस || 

तेवढीच किंमत वेदांस | 

देई ज्ञानी ब्राह्मण || अ.२, ओ. ४६ ||

अधिकार तुझा केवळ कर्मावर | नाही कधीही कर्मफलावर || 

कर्मफलहेतूस ठेव दूर | कर्म मात्र टाळू नको || अ.२, ओ.४७||

कर कर्मे योगात राहुनी | धनंजया, आसक्ती सोडुनी || 

सिद्धी-असिद्धी समान मानुनी | या समानतेस योग म्हणती || अ.२, श्लो. ४८||

कर्म फार न्यून | धनंजया, बुद्धियोगाहून || 

फळाचा हेतू असणारे जन असती कृपण I म्हणून तू बुद्धीचा आधार घे || अ.२, ओ.४९||

बुद्धियुक्त त्यागतो उभय | पाप आणि पुण्य || 

तेव्हा योगाचा घे आश्रय | कर्मातील कौशल्य म्हणजेच योग || अ. २, ओ. ५०||

कर्मातून झालेले उत्पन्न | फळ, बुद्धियुक्त जन टाकून || 

मुक्त होती जन्मबंधनातून | जाती निरामय पदाला || अ. २, ओ. ५१||

जेव्हा मोहाचे जंगल | बुद्धी पार करील || 

तुला  निरुपयोगी वाटेल | ऐकलेले आणि ऐकावे असे || अ. २, ओ.५२||

श्रुतींमुळे झालेली चंचल | होईल जेव्हा निश्चल || 

बुद्धी समाधीत अचल | तेव्हा साधशील योग || अ.२, ओ.५३||

अर्जुन म्हणाला

‘स्थितप्रज्ञ, जो समाधीत स्थिर झाला | केशवा सांग मला | 

बोलेल काय शब्दांला | असेल कसा, वागेल कसा’ || अ.२, ओ.५४||

श्रीभगवान म्हणाले

‘हे पार्था, स्थितप्रज्ञ म्हणती त्यास | जो सोडून सर्व इच्छांस || 

मानतो संतोषास | स्वत:च्याच ठायी || अ.२, ओ.५५||

जो न उद्विग्न दु:खात | ज्याची इच्छा न सुखात || 

जो प्रेम, राग, भीतीपासून मुक्त | स्थितप्रज्ञ म्हणती त्यास ||अ.२, ओ.५६||

सर्वत्र जो अनासक्त | शुभ आणि अशुभापासून अलिप्त || 

हर्ष आणि द्वेषापासून मुक्त | स्थिर त्याची बुद्धी || अ.२, श्लो.५७||

जो घेतो आवरूनी | 

इंद्रिये इंद्रियविषयांपासुनी | 

कासव जसे अवयव सर्व बाजूंनी | 

स्थिर त्याची बुद्धी ||अ.२, ओ.५८||

जीवात्म्याची निराहारातुनी | निवृत्ती होई विषयांतुनी, न त्यांच्या आसक्तीतुनी || 

निवृत्ती आसक्तीतुनी | होई पराच्या दर्शनाने ||अ.२, ओ.५९||

पुरुषाने ज्ञानी | प्रयत्नही करूनी || 

मन दुसरीकडे नेती ओढुनी | त्रासदायक इंद्रिये || अ. २, ओ.६०||

तेव्हा इंद्रियांस करून संयमित | युक्त हो माझ्यात || 

इंद्रिये ज्याची ताब्यात | स्थिर त्याची बुद्धी || अ. २, ओ. ६१||

विषयांचे जो करी चिंतन I 

विषयासक्त होई त्याचे मन II

काम जन्मतो विषयांतून I 

कामातून जन्म क्रोधाचा || अ. २, ओ. ६२||

जन्म क्रोधातून संमोहाचा I 

संमोहातून स्मृतिनाशाचा II

स्मृतिनाशातून बुद्धिनाशाचा I 

बुद्धिनाशातून होई सर्वनाश || अ. २, ओ. ६३||

जो मुक्त आसक्ती आणि द्वेषापासून | इंद्रियांना ठेवून स्वाधीन || 

वावरतो विषयांतून || तो विधेयात्मा प्रसन्नता पावतो || अ.२, ओ.६४||

पावता प्रसन्नतेस | दु:खे जाती लयास || 

स्थिरता येई बुद्धीस | लगेच || अ.२, ओ.६५||

बुद्धीचा लाभ न अयुक्तास | न जाणी तो भावनेस || 

भावनेअभावी न शांती त्यास | नसता शांती नसे सुख त्यास || अ।२, ओ.६६||

भटकता इंद्रियांनी | 

त्यांच्या पाठी जाऊनी || 

मन बुद्धीस नेते ओढुनी | 

जसा वारा ओढतो पाण्यातील नावेस ||अ.२, श्लो. ६७||

महाबाहो म्हणूनी | इंद्रियांस विषयांपासूनी || 

घेतो जो आवरूनी | स्थिर त्याची बुद्धी ||अ. २, श्लो.६८||

सर्व भूतांसाठी रात्र होता | संयमी राखतो जागृतता || 

सर्व भूते जागी राहता | मुनी पाही रात्र  ती || अ.२, ओ६९||

सर्व बाजूंनी भरताही जल | 

समुद्र जसा राहतो आपल्या मर्यादेत अचल || 

तसा जो राहतो स्थिर, इच्छांत सकल | 

तो पावतो शांती, न भोगेच्छू || अ.२, ओ.७०||

जो सर्व इच्छांचा त्याग करतो | आणि नि:स्पृहपणे राहतो || 

निर्मम निरहंकारी पुरुष तो | पावतो शांती || अ.२, ओ.७१||

पार्था, हीच ती ब्राह्मी स्थिती | प्राप्त होता न मोह पावती || 

अंतकाळीही स्थिर राहती | पावती ब्रह्मनिर्वाणास || अ.२, ओ.७२||


अशा प्रकारे भगवद्गीता या चांगल्या उपनिषदातील, ब्रह्मविद्येतील योगशास्त्रातील, श्रीकृष्ण आणि अर्जुन यांच्या संवादातील 'सांख्ययोग' नावाचा दुसरा अध्याय पूर्ण झाला.


भजनरूप श्री गणपति अथर्वशीर्ष


श्रीगणेशाची भजने


संकटनाशन गणेशस्तोत्र


वक्रतुंडा एकदंता

कृष्णपिंगाक्षा चिन्मया

मंगलमूर्ती मोरया

गणपतिबाप्पा मोरया


गजवक्त्रा लंबोदरा

विकटा गौरीप्रिया

मंगलमूर्ती  मोरया

गणपतिबाप्पा मोरया


विघ्नराजेंद्रा धूम्रवर्णा

भालचंद्रा शिवतनया

मंगलमूर्ती  मोरया

गणपतिबाप्पा मोरया


विनायका गजानना

चतुर्हस्ता नारदप्रिया

मंगलमूर्ती  मोरया

गणपतिबाप्पा मोरया


भजनरूप श्रीगणपति-अथर्वशीर्ष


श्रीगणेशाय नम:


गणेशा तुझे अथर्वशीर्ष 

भजनरूपे गातो मी |

नमुनी तुजला सकलाद्या |

वंदुनि तुजला विघ्नहर्त्या |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया ||


तत्त्व तू कर्ता तू

धर्ता तू, हर्ता तू

ब्रह्म तू, आत्मा तू || १ ||

सांगतो मी त्रिकालसत्या |

मंगलमूर्ती  मोरया

गणपतिबाप्पा मोरया || २ ||


र‌क्षण कर तू सदैव माझे |

रक्षण कर तू वक्त्याचे |

रक्षण कर तू दात्याचे |

रक्षण कर धारकाचे |

र‌‌क्षण कर अनुयायाचे |

र‌‌क्षायाला ये शिष्या |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया || 


रक्षण कर पश्चिमेकडूनी |

रक्षण कर पूर्वेकडूनी |

रक्षण कर उत्तरेकडूनी |

र‌क्षण कर दक्षिणेकडूनी |

र‌क्षण कर तू  ऊर्ध्व दिशेने |

रक्षण कर तू अर्ध्व दिशेने|

सभोवती सर्व दिशांनी |

येई मजला रक्षाया |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया || ३ ||


वाङ्मय तू चिन्मय तू |

आनंदमय, ब्रह्ममय तू |

सच्चिदानंद, अद्वितीय तू |

प्रत्यक्ष ब्रह्म तेच तू |

तू ज्ञानमय, विज्ञानमय |

व्यापसी त्रैलोक्या   |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया || ४ ||


तुझ्यातुनि जग  जन्म पावते |

तुझ्यात जग हे स्थिर राहते |

तुझ्यात जग हे लयास जाते |

प्रसवते तुझ्यात विश्वशरण्या |

भूमी, आप, अनल, अनिल, नभ |

चार वाक्पदे ठायी तुझिया |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया || ५ ||


गुणत्रयातीत तू |

अवस्थात्रयातीत तू |

देहत्रयातीत तू |

कालत्रयातीत तू |

मूलाधारामध्ये तू |

शक्तित्रयातीत तू |

योगी ध्याती नित्य तुला |

योग्यांच्या ध्यानविषया |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया ||


ब्रह्मा तू विष्णु तू |

रुद्र तू इंद्र तू |

अग्नि तू वायु तू |

सूर्य तू चंद्रमा तू |

ब्रह्म तू भूमि तू |

नभ आणि ॐकार स्वर |

सर्व काही तूच तू |

विश्वाच्या कैवल्या |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया || ६ ||


पहिले अक्षर 'ग्' म्हणावे |

पहिला वर्ण 'अ' म्हणावा |

अर्धचंद्र अन् अनुस्वारयुक्त |

मंत्ररूप तव भक्तिगम्या |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया ||


'ग'कार हे पूर्वरूप |

'अ'कार हे मध्यमरूप |

अनुस्वार हे अंत्यरूप |

बिंदु हे उत्तररूप |

नाद जोडुनी एकसंध |

मंत्र होई तव भक्तहृदया |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया || 

 

गणेशविद्या अशी ही |

गणकऋषींनी कथिलेली |

निचृद्गायत्री छंद जिचा |

देवता अन् गणपति |

'ॐ गॅं गणपतये नम:' |

जपा सदैव मंत्रा या |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया || ७ ||


जाणतो एकदंताला

ध्यातो वक्रतुंडाला

जेणेकरून प्रसन्न करू

आपण सारे दंतीला त्या

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया || ८ ||


गणेश आहे रक्तवर्ण |

सुपासारखे त्याचे कर्ण |

लंब उदर त्याचे आहे |

दात एकच त्याला आहे |

हात चार असती त्याला  |

पाश  पहिल्या करात |

दुसऱ्या हाती अंकुश |

तिसऱ्या करी हस्तिदंत | 

चौथा कर तो उन्नत स्थितीत |

द्यावया  भक्तांस  वर |

रक्तगंध अनुलेप तयाला |

रक्तवस्त्र अंगावर |

रक्तफुलांनी होई पूजन |

मूषक त्याचे आहे वाहन |

भक्तांच्या हृदयी वसतो

भक्तांवरी तो करी दया |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया


गणेश अच्युत देव असा |

आहे कारण जगताचे |

आरंभी सृष्टीच्या  |

प्रगटले रूप त्याचे |

प्रकृति आणिक पुरुष |

यांच्या पलीकडे आहे |

असे जाणुनी ध्यातो गणेश |

श्रेष्ठ योगी तो जगी या |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया || ९||


व्रातपतीला, गणपतीला |

प्रमथपतीला नमन असो|

लंबोदराला, एकदंताला |

विघ्ननाशकाला नमन असो |

शिवसुताला, वरदमूर्तिला |

नमू या नमू या |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया || १० ||


अथर्वशीर्ष जो हे ध्यातो

पावतो तो ब्रह्मपदा 

सर्व सुखे त्यास लाभती

विघ्ने सारी जाती लया |

मंगलमूर्ती  मोरया |

गणपतिबाप्पा मोरया || ११||


श्रीगणेशार्पणमस्तु


अष्टविनायक:


मोरेश्वरा विघ्नेश्वरा

बल्लाळेश्वरा भक्तप्रिया

मंगलमूर्ती मोरया 

गणपतिबाप्पा मोरया


वरदविनायका चिंतामणी

सिद्धिविनायका सिद्धिदात्या

मंगलमूर्ती मोरया 

गणपतिबाप्पा मोरया


विघ्नेश्वरा महागणपती

अष्टविनायका ध्यानगम्या

मंगलमूर्ती मोरया 

गणपतिबाप्पा मोरया















Wednesday, October 30, 2024

श्रीमद्भगवदगीता अध्याय १- अर्जुनविषादयोग

श्रीमद्भगवदगीता 

अध्याय १- अर्जुनविषादयोग

(c) Dr Hemant Junnarkar, All rights resertved

 धृतराष्ट्र म्हणाला

कुरुक्षेत्र म्हणजे धर्मक्षेत्र I तेथे युद्धासाठी जमलेले एकत्र II 

पांडव आणि माझे पुत्र I करतात काय, सांग संजया II अ.१ ओ.१ II

दुर्योधनाकडून कौरव आणि पांडवांच्या सैन्यांचे वर्णन:

 संजय म्हणाला

पांडवांचे विशाल सैन्य पाहून I राजा दुर्योधन II

आचार्यांजवळ (=द्रोणाचार्यांजवळ) जाऊन I असे म्हणाला, II अ.१ ओ.२ II

‘पांडुपुत्रांचे हे मोठे सैन्य I बघून घ्या आचार्य II  

द्रुपदपुत्र, तुमचा बुद्धिमान शिष्य, I त्याने रचलेले   II अ.१ ओ.३ II 

युद्धात येथे महाधनुर्धर I भीम आणि अर्जुन शूर II 

तसेच महारथी थोर I युयुधान, विराट, द्रुपद II अ.१ ओ. ४II

धृष्टकेतु आणि चेकितान I काशिराज वीर्यवान II

पुरुजित्, कुंतिभोज वीर महान I तसाच शैब्य नरश्रेष्ठ II अ.१ ओ. ५II

युधामन्यू आणि विक्रांत | उत्तमौजा वीर्यवंत ||  

सौभद्र आणि द्रौपदीचे सुत | सारेच महारथी ||अ.१ ओ.६ ||

आता जे विशेष आमचे | नायक माझ्या सैन्याचे || 

ज्ञान करून देतो त्यांचे | तुम्हास हे द्विजोत्तम || अ. १ ओ.७ ||

भीष्म आणि स्वत: आपण | नेहमी जिंकणारे कृप आणि कर्ण || 

अश्वत्थामा, विकर्ण | तसाच सौमदत्ती || अ. १, ओ. ८ ||

आणखी आहेत पुष्कळ शूर | माझ्यासाठी जिवावर उदार || 

जाणती विविध शस्त्रांचा वापर | सारे निपुण युद्धात || अ. १, ओ. ९ ||

असे अमर्याद सैन्य आमचे | भीष्म करती रक्षण ज्याचे || 

मर्यादित परी हे सैन्य त्यांचे | रक्षिलेले भीमाने || अ.१, ओ.१०||

सर्व व्यूहद्वारस्थानी | नेमून दिलेल्या ठिकाणी राहूनी || 

करावे आपण सर्वांनी | भीष्मांचेच रक्षण’ || अ.१, ओ. ११||

दोन्ही सैन्यातील प्रमुख योद्धयांकडून शंखनाद

मग कुरुवृद्ध प्रतापवान पितामहांनी | सिंहगर्जना करूनी || 

शंख फुंकूनी | आनंदित केले दुर्योधना || अ.१, ओ.१२ ||

तेव्हा शंख आणि भेरी | पणव, आनक, गोमुख अशी वाद्ये सारी || 

नाद करती भारी | एकदम वाजू लागता || अ.१ ओ.१३ ||

तेव्हा युक्त शुभ्र घोड्यांनी | रथात मोठ्या बैसुनी || 

करीती दिव्य शंखांचा ध्वनी | माधव आणि पांडव  || अ.१, ओ.१४||

पांचजन्य हृषीकेशाने | देवदत्त धनंजयाने || 

पौंड्र भीमकर्मा वृकोदराने | शंख असे वाजविले || अ. १, ओ. १५II

अनंतविजय कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिराने | सुघोष नकुलाने || 

मणिपुष्पक सहदेवाने | शंख असे वाजविले || अ. १, ओ.१६II

काशिराज धनुर्धर-शिरोमणी | शिखंडी महारथी अग्रणी ||  

ध्रुष्टद्युम्न आणि विराट नृमणी | अपराजित सात्यकी || अ.१, ओ. १७||

द्रुपदराजा आणि पुत्र द्रौपदीचे | सौभद्र, बाहू मोठे ज्याचे || 

सर्वांनी विविध शंखांचे | नाद केले महाराज || अ.१, ओ. १८||

तो घोष पडता कानी | धार्तराष्ट्रांची हृदये गेली विदीर्ण होऊनी || 

त्या नादाने गेले दुमदुमुनी| पृथ्वी आणि आकाश ||अ. १, ओ. १९||

धार्तराष्ट्रांस सिद्ध पाहून | रथावरी ज्याच्या शोभे हनुमान || 

तो पांडव धनुष्य उचलून | शस्त्रप्रहार करण्याआधी || अ. १, ओ.२०||

वाक्य असे हृषीकेशाला | हे राजा बोलला || 

 अर्जुन म्हणाला

'हे अच्युता, आण रथ आपला || दोन्ही सैन्यांच्या मध्यभागी || अ.१, ओ.२१II

मला आहे निरीक्षण करायचे | युद्धासाठी इच्छुकांचे || 

कुणाविरुद्ध मला लढायचे | या रणसंग्रामात || अ.१ ओ. २२||

मला आहे अवलोकन करायचे | युद्धास एकत्र आलेल्यांचे || 

धार्तराष्ट्राच्या दुर्बुद्धीचे I प्रिय इच्छिणाऱ्यांचे || अ. १, ओ. २३ ||

 असे सांगता त्या क्षणास | गुडाकेशाने हृषीकेशास || 

हृषीकेशाने आणून त्या उत्तम रथास || हे भारता, दोन्ही सैन्यांमध्ये- || अ. १ ओ २४ ||

-सर्व राजांच्या, | समोर भीष्मद्रोणांच्या ||  

श्रीभगवान म्हणाले

'समोर जमलेल्या या |कुरूंना पहा पार्था’ || अ. १, ओ. २५ ||

अर्जुनाकडून सैन्याचे निरीक्षण आणि अर्जुनाचा विषाद:

तेथे पार्थाने पाहिले | काका आणि आजोबा आपले || 

आचार्य, मामा, भाऊ उभे ठाकले | मुलां-नातवंडां-मित्रांसह || अ. १ ओ. २६ ||

सुहृद आणि श्वशुर | दोन्ही सैन्यांत समोर || 

बंधू सारे युद्धास तयार | पाहून तो कौंतेय || अ. १, ओ. २७II

 होऊन फार करुणा-ग्रस्त | बोलला होऊन दु:खित || 

अर्जुन म्हणाला, 

‘पाहून हे उपस्थित | युद्धासाठी स्वजन || अ.१, ओ. २८||

अवयव जातात गळून | तोंडास कोरड पडून || 

कापरे भरून | काटा येतो अंगावर || अ. १, ओ. २९||

गांडीव धनुष्य हातातून गळते | त्वचा सारी जळते || 

उभे न मला राहवते | भटकते माझे मन ||अ. १, ओ. ३० ||

लक्षणे सारी निश्चित | केशवा, विपरीत दिसतात || 

न दिसे काही हित | स्वजनांस युद्धात मारूनीया || अ.१, श्लो. ३१||

नको मला विजय | 

नकोत सुखे, नको राज्य || 

गोविंदा, कामाचे ते काय | 

राज्य किंवा जीवन || अ.१, ओ.३२||

ज्यांच्यासाठी इच्छा करायची | राज्य, भोग आणि सुखांची || 

त्यांची तयारी युद्धाची | प्राण आणि धन सोडून || अ.१, ओ.३३||

आचार्य, पुत्र, पितर | पितामह बरोबर || 

मामा, नातवंडे, श्वशुर | मेहुणे आणि इतर नातलग || अ. १, ओ. ३४ ||

मी न इच्छितो यांस मारण्याला | मधुसूदना, जरी गेलो मारला || 

किंवा दिले जरी त्रैलोक्याचे राज्य मला | काय कथा पृथ्वीची || अ.१, ओ. ३५ ||

मारून धार्तराष्ट्रांस | जनार्दना, सुख काय आम्हास || 

पापच येईल आश्रयास | या आततायांस मारिता || अ.१, ओ.३६ ||

न योग्य मारणे आम्ही त्यांना | स्वबांधवांना - धार्तराष्ट्रांना || 

कसे मारून स्वजनांना | व्हावे सुखी माधवा || अ. १, ओ. ३७ ||

लोभामुळे झाला यांचा | नाश बुद्धीचा || 

दिसे न दोष कुळक्षयाचा | आणि पाप मित्रद्रोहाचे || अ.१, ओ.३८||

मला न येई उमगून | कसे निवृत्त व्हावे या पापातून || 

स्पष्ट दिसत असून | कुलक्षयाचा दोष जनार्दना || अ.१, ओ. ३९||

नाश होता कुळाचा | -हास होतो सनातन कुळधर्माचा || 

बसे पगडा अधर्माचा | कुळावरी साऱ्या || अ.१, ओ. ४०||

कृष्णा, अधर्म माजता | कुलस्त्रिया जाती अध:पाता || 

वार्ष्णेया, स्त्रिया दूषित होता | वर्णसंकर होतसे ||अ.१, ओ.४१||

कुलनाशकांच्या कुळात संकर घडतो | तो नरकास कारण होतो ||

पितरांचेही पतन घडवतो I पिंडोदकक्रियांचा लोप होता ||अ.१, ओ.४२||

वर्णसंकरकारक या | दोषांनी कुलनाशकांच्या  || 

जाती लया | शाश्वत जातिधर्म, कुलधर्म || अ.१, ओ. ४३||

कुलधर्म लयास गेलेल्या | जनार्दना, अशा मनुष्यां || 

नरकात लागे राहावया | असे आम्ही ऐकतो || अ.१, ओ. ४४ ||

अरेरे, केवढ्या पापास | तयार झालो करावयास || 

मिळवण्या राज्यसुखास | उठलो स्वजन मारण्या || अ.१, ओ.४५||

मी न करताही प्रतीकार | हाती न धरताही हत्यार  || 

धार्तराष्ट्र करतील माझा संहार | परवडेल ते मला’ ||अ.१, ओ. ४६||

अर्जुन असे रणात बोलून | गेला रथात बसून || 

धनुष्यबाण टाकून | शोकाकुल मनाने ||अ.१, ओ.४७||


China Trip

  DAY 1 - Australia (or New Zealand) – Beijing, China May 22 Australia (or New Zealand) – Beijing, China Today, you'll depart to Beijing...