नलकुबेर और मणिग्रीव की कहानी
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यह कहानी भगवान श्रीकृष्ण के बचपन की है | भगवान श्रीकृष्ण का अवतार सिर्फ दुष्टों को दंड देने के लिये नहीं, परंतु पतितों की मुक्ति के लिये भी था | बचपन में उन्हों ने की हुई मामुली हरकतों के पीछे कोई गहन अर्थ दिखाई देता हैं | यह कहानी इस बात को साबीत करती हैं | कहानी संक्षेप में कुछ इस तरह हैं |
भगवान श्रीकृष्ण बचपन में अपने पिता नंद बाबा और यशोदा मैया के साथ रहते थे | एक दिन सुबह−सुबह माता यशोदा दही मथ रही थीं और नंद बाबा गौशाला में बैठकर गायों का दूध दुहवा रहे थे | तभी भगवान श्रीकृष्ण जाग गए और माता यशोदा से दुग्ध पान की जिद करने लगे। किंतु काम में व्यस्त होने के कारण यशोदा को थोड़ी देर हो गई। भगवान श्रीकृष्ण रूठ गए और गुस्से में यशोदा मैया के हाथ की मथनी तोड़ डाली। यशोदा मैया को भी क्रोध आ गया। उन्होंने एक रस्सी से भगवान श्रीकृष्ण को बांध दिया और रस्सी आंगन में रखे हुए एक ऊखल को बांध दी।
यह कहानी कुछ इसी तरह से भी कही जाती हैं | भगवान श्रीकृष्ण बचपन में बहुत शरारतें करते थे | गोपिया न सोच सकी कि इस का कैसे हल किया जाये | उन की शरारतों से तंग आकर सब गोपिया मिलकर यशोदा मैया के पास आई और भगवान श्रीकृष्ण की काफ़ी शिकायतें करने लगी |
एक गोपी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और उन के साथी उस गोपी के घर में घुस गये और दस घड़ों में भरा हुआ दही और घी खा गये | दूसरे गोपी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और साथियों ने उस गोपी के घर आकर घड़ों और छीकों में रखा हुआ मक्खन खाकर घड़े फोड़ दिये और छीके तोड़ डाले | तीसरे गोपी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने उस गोपी के घर के गौ और बछडे़ जंगल में हांक दिये | इस तरह की कई और शिकायतें करके गोपियों ने कहा कि ऐसा ही होते रहा, तो उन्हे वह जगह छोड़कर और कही रहने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं रहेगा |
गोपियों की बातें सुन कर यशोदा ने हर किसी को समझाया | उन का जो कुछ नुकसान हुआ था, वह पूरा करने का आश्वासन उन्हे दिया और उन्हें यह भी कहा कि वह लडके को अभी ऐसे काबू करेगी कि फिर कभी वह ऐसा काम नहीं कर पायेगा |
इस तरह से गोपियों को आश्वस्त करके भेजकर यशोदा मैया ने कृष्ण को बुलाया और उसे बहुत डॉंटकर उस की बॉंह पकडकर गाडी के पास ले गई | बड़े ओखल से एक रस्सी बॉंधकर उस के कमर में उस ने बॉंध दी | फिर एक बेत लेकर कहा, 'अगर तुम यहॉं से हिले तो देखना क्या करती हूॅं', और ऐसा कहकर वह अपने घर के कामों में लग गई |
पशुओं के छप्पर के पास दो पेड़ थे | कृष्ण ओखल पहियेवाले खिलौने की तरह घसीटता घसीटता उन दोनों पेड़ के बीच में ले गया | फिर उस ने ओखल यूॅं ज़ोर से खींचा कि दोनों पेड़ फड़फड़ाते नीचे गिर गये |
वृक्षों के गिरने से भारी शोर हुआ | कई गोप गोपिया भागी भागी आई | क्या हुआ था उन्होंने भी देखा | कुछ गोपिकाओं ने यशोदा के पास जाकर कहा,
'तेरा लड़का भी क्या राक्षस हैं | उसे भी कहीं ओखल से बॉंधा जाता हैं? वह बड़े बड़े पेड़ उखाड़कर अपने ऊपर डाल रहा हैं | सोच रही हो तुम ने बड़ा अक्लमंदी का काम किया हैं | जाकर देखो कही लड़के पर आफ़त न आ पड़े | '
यह सुनते ही यशोदा का दिल धड़का | वह कॉंप उठी | वह तेज़ी से भागने लगी , न उसे चोटी की फ़िक्र थी , न ऑंचल की ही, उबड़ ताबड़ भागी |
नंद बाबा और सब पड़ोसी भी वहाँ दौड़ते हुए पहुँचे। तब सभी ने एक चमत्कार देखा। उन वृक्षों में से दो सुंदर दिव्य युवक, भगवान श्रीकृष्ण के सामने खड़े थे। उन्हों ने भगवान श्रीकृष्ण के सामने लीन होकर उन्हे प्रणाम किया | अपनी मुक्ति के लिये उन्हों ने भगवान श्रीकृष्ण को धन्यवाद दिया | फिर वे अंतर्धान होकर अपने लोक को चले गए।
अब वह दिव्य युवकों की कहानी समझ लेते हैं | देवों का कोष सम्हालने वाले देव कुबेर के दो पुत्र थे, एक का नाम नलकूबर था और दूसरे का मणिग्रीव। कुबेर के ये दोनों बेटे अपने पिता की धन−सम्पत्ति के प्रमाद में घमंडी और उद्दंड हो गए थे। राह चलते लोगों को छेड़ना, उन पर व्यंग्य कसना, ग़रीब लोगों का मखौल उड़ाना उन दोनों की प्रवृत्ति बन गयी थी।
एक दिन दोनों भाई नदी में स्नान कर रहे थे। तभी आकाश मार्ग से आते हुए उन्हें देवर्षि नारद दिखाई दिए। उनके मुख से ‘नारायण−नारायण’ का स्वर सुनकर नदी पर स्नान के लिए पहुँचे लोग उन्हें प्रणाम करने लगे, लेकिन नलकूबर और मणिग्रीव तो अपने पिता के धन के कारण दंभ में भरे हुए थे। उन्होंने नारद को प्रणाम करने के स्थान पर उनकी ओर मुँह बिचकाया और उनका उपहास उड़ाया।
उन दोनों का व्यवहार नारद को बहुत अखरा। क्रोध में भरकर उन दोनों को शाप दे दिया कि वह दोनों मर्त्यलोक में वृक्ष बनकर रहेंगे | शापवश वह दोनों मर्त्यलोक में, गोकुल में नंद बाबा के द्वार पर पेड़ बन कर खड़े हो गए। भगवान कुबेर को अपने पुत्रों की दुर्दशा की ख़बर मिली तो वह बहुत दुःखी हुआ और महर्षि नारद से बार−बार क्षमा याचना करने लगे। नारद जी को उन पर दया आ गई। उन्होंने अपने शाप का परिमार्जन करते हुए कहा, ‘ द्वापर युग में भगवान विष्णु भगवान श्रीकृष्ण के रूप में वहाँ अवतरित होंगे और दोनों वृक्षों का स्पर्श करेंगे तब उन्हें मुक्ति मिल जाएगी।’
इस तरह से भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला से नलकूबर और मणिग्रीव को मुक्ति मिल गई |
इस कहानी से हमें कई सीखें मिलती हैं | एक सीख ऐसी है कि जो लोग वासनाविवश होकार अपने इंद्रियों पर काबू नहीं कर पाते हैं, उन्हें नलकूबर और मणिग्रीव जैसे वृक्षरूप बन गये उसी तरह वृक्ष की गति मिलती हैं | ऐसी स्थिति में वह हलचल भी नहीं कर पाते |
दूसरी सीख यह हैं कि अपनी वासनाओं पर काबू पाने के लिये हमें भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाना चाहिए और उन की भक्ति में लीन रहना चाहिये |




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