Saturday, August 9, 2025

हमारी धरती और हम

हम इन दिनों जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण संरक्षण आदि के बारे में बहुत कुछ पढ़ और सुन रहे हैं। पर्यावरण की रक्षा हम सबकी ज़िम्मेदारी है और इसके लिए हम सबका मिलकर काम करना बेहद ज़रूरी है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बच्चों को यह कैसे समझाया जाए?

तो लीजिए, श्री. पारितोष तिरोडकर अपनी नई किताब के साथ आपकी मदद के लिए हाज़िर हैं। किताब का नाम है,  The world is melting-how to talk to kids about climate change" | आइए देखें कि लेखक क्या कहते हैं।

१. आपका बेटा (या बेटी) जलवायु परिवर्तन के बारे में क्या सोचता है?

आपका बेटा हर चीज़ पर नज़र रख रहा है। वह मौसम में बदलाव देखता है और सवाल पूछता है, "इन दिनों इतनी गर्मी क्यों पड़ रही है? अभी तक बारिश क्यों नहीं हुई?"

२. जलवायु परिवर्तन को सरल शब्दों में समझाइए।

आपका बच्चा प्रश्न पूछ रहा है, जिसका अर्थ है कि वह उस विषय पर विचार कर रहा है।

तो सबसे पहले, बच्चे के प्रश्न को ध्यान से सुनें। इससे आपको यह समझने में मदद मिलेगी कि वह क्या कहना चाह रहा है।

आपके बच्चे को जलवायु परिवर्तन का पूरा विज्ञान जानने की ज़रूरत नहीं है। उसे उसकी उम्र के अनुसार समझाएँ।

अगर आपका बच्चा ३-६ साल का है, तो उसे रोचक कहानियों के ज़रिए समझाएँ।

अगर आपका बच्चा ७-१० साल का है, तो वह बहुत कुछ जानता है। उसे समझाएँ कि जलवायु परिवर्तन का कारण क्या है।

११-१४ साल के बच्चे के लिए, आप इस विषय पर और गहराई से जा सकते हैं समझा सकते हैं कि जलवायु परिवर्तन दुनिया को कैसे प्रभावित कर रहा है।

जलवायु परिवर्तन को एक संकट के रूप में नहीं, बल्कि चिंता का विषय समझें। आपके उत्तर का सटीक होना ज़रूरी नहीं है। ज़रूरत से ज़्यादा व्याख्या न करें या डरावने आँकड़े न दें।

अपने बच्चे को डराएँ नहीं। 'अब हमारी कोई खैर   नहीं है',  ऐसे जवाब न दे। कहें, 'कई लोग इस स्थिति से निकलने का रास्ता ढूँढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। हम भी कुछ कर सकते हैं।'

अगर आपका बच्चा और सवाल पूछे तो उसे प्रोत्साहित करें।

अब, अगर आपका बच्चा आपसे पूछे कि हम पर्यावरण की रक्षा के लिए क्या कर सकते हैं, तो आप कुछ आसान उपाय सुझा सकते हैं।

३. पर्यावरण के अनुकूल आदतें 

घर पर अच्छी आदतें डालना ज़रूरी है क्योंकि बच्चे जो देखते हैं, उसकी नकल करते हैं। कुछ आसान आदतें हैं जैसे दाँत ब्रश करते समय नल बंद करना, कमरे से बाहर निकलते समय लाइट बंद करना।

अगर आप अपने बच्चे को ज़्यादा सम्मान देंगे, जैसे, 'आज से तुम लाइट चेकर हो, तुम पानी के मैनेजर हो', तो उसका हौसला और भी बढ़ेगा। आप घर पर कुछ गतिविधियाँ कर सकते हैं, जैसे, इको संडे या पर्यावरण के अनुकूल रविवार, कचरा मुक्त मंगलवार। इससे घर में पर्यावरण के अनुकूल माहौल बनेगा।

हमारे यहाँ होली, गणेशोत्सव, दिवाली जैसे कई त्योहार आते हैं। ऐसे त्योहारों के अवसर पर पर्यावरण के अनुकूल रंगों, गणेश प्रतिमाओं आदि का प्रयोग करें।

खाने की बर्बादी कम करें, कम्पोस्ट बिन शुरू करें, इस्तेमाल न होने पर लाइट, पंखे और उपकरण बंद कर दें।

आप अपने बच्चे की रुचियों को देखकर उसे प्रकृति की डायरी लिखना, इमोशन कार्ड आदि जैसी चीज़ें सिखा सकते हैं।

उपदेश देने, झिड़कने या अपराधबोध पैदा करने से शायद ही कोई बदलाव आता है। इसके बजाय, आप खुद आदर्श बरताव करे ताकि आप का बच्चा आप का  अनुकरण करे ।  जब आपका बच्चा आपको पुराने बैगों का दोबारा इस्तेमाल करते, स्थानीय पौधों से बने खाद्य पदार्थ चुनते देखेगा, तो वह आपकी ओर देखेगा और आपके जैसा व्यवहार करने की कोशिश करेगा।

४. प्रकृति और जानवरों के प्रति सम्मान

जब आपका बच्चा बिना थोडे फूल देखने का आनंद लेता है या बिना डरे किसी आवारा जानवर की मदद करता है, तो उसकी पीठ थपथपाएँ।

५. बड़ी समस्याएँ

प्रदूषण, वनों की कटाई जैसी समस्याएँ और भी बड़ी हैं। इसलिए अगर आपका बच्चा इनके बारे में पूछे, तो अपनी व्याख्या सरल रखें। उसे विश्वास दिलाएँ कि इसका भी समाधान है।

६. अपने बच्चे को व्यस्त, डिजिटल दुनिया में भी पर्यावरण पर भरोसा करना सिखाएँ

आज की तेज़, शोरगुल वाली, स्क्रीन से भरी दुनिया में एक बच्चे के लिए पर्यावरण पर भरोसा करना कैसे संभव है? तो यह करें। पर्यावरण के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए इन डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करें। उदाहरण के लिए, जब आप कार में हों, तो आप पर्यावरण के बारे में पॉडकास्ट सुन सकते हैं या पर्यावरण पर बातचीत कर सकते हैं। आप पर्यावरण विषय पर वृत्तचित्र देख सकते हैं, खेल खेल सकते हैं।

७. कहानियों, फिल्मों और उनके नायकों जैसे माध्यमों का इस्तेमाल करें

बच्चों को नायक पूजा बहुत पसंद होती है। वे खुद को नायक मानकर जीते हैं। अब ऐसे कई जलवायु नायकों या योद्धाओं को कॉमिक्स और फिल्मों के माध्यम से लोकप्रिय बनाया गया है। पर्यावरण विषय पर कई फिल्में बनी हैं। तो अपने बच्चों को ऐसा साहित्य पढ़ने या ऐसी फिल्में देखने दें।

८. स्कूल, दोस्तों और समूहों का महत्व

आपके बच्चे की दुनिया घर तक ही सीमित नहीं है। यह स्कूल के गलियारों, खेल के मैदानों, जन्मदिन पार्टियों और व्हाट्सएप ग्रुप तक फैली हुई है। स्कूलों में, आप पर्यावरण-अनुकूल परियोजनाओं को बढ़ावा दे सकते हैं। आप पर्यावरण-अनुकूल विचारों को बढ़ावा देने के लिए अन्य दोस्तों के साथ मिल सकते हैं। जन्मदिन की पार्टियों को इस तरह रखें कि कम से कम कचरा उत्पन्न हो।

९. मेरा बच्चा सुन नहीं रहा है, मुझे क्या करना चाहिए?
अगर आपको लगता है कि आप का  बच्चा आप की सुन नहीं रहा है, तो आपको उसके साथ और अधिक भावनात्मक जुड़ाव बनाने की ज़रूरत है। आपको अपने बच्चे के साथ ज़्यादा समय बिताना चाहिए। उसके कामों के लिए उसकी प्रशंसा करें, ताकि वह और अधिक करने के लिए प्रोत्साहित हो।

१०. जलवायु आशावाद:

जलवायु आशावाद यह विश्वास है कि भले ही हालात गंभीर हों, लोग बदलाव ला सकते हैं और ला रहे हैं। बच्चों को सिखाएँ कि वे भी बदलाव ला सकते हैं। इसलिए, बच्चों को बताएँ कि क्या कारगर है, जैसे ऊर्जा की ज़रूरतों के लिए सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बढ़ाना, पेड़ लगाने के बारे में जागरूकता बढ़ाना।

११. पृथ्वी की रक्षा:

इस सारी चर्चा से, आप समझ गए होंगे कि पृथ्वी की रक्षा करना सबकी ज़िम्मेदारी है और सिर्फ़ पृथ्वी को आपदाओं से बचाना ही काफ़ी नहीं है। इस ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए परिपूर्ण प्रयास की ज़रूरत नहीं है। अपूर्ण प्रयासों के भी अपने प्रभाव होते हैं। अपने बच्चे को बताएँ कि पृथ्वी की रक्षा के लिए वह जो कर रहा है, वह बहुत कुछ है। आपका बच्चा पृथ्वी में बदलाव ला रहा है, पृथ्वी का निर्माण कर रहा है - प्रेम और आशा के साथ। पृथ्वी हमसे बस यही अपेक्षा करती है।

पुस्तक के बारे में:
यह पुस्तक हमें पर्यावरण संरक्षण के बारे में बहुत कुछ बताती है। लेखक का ध्यान पूर्णता पर ज़ोर देने के बजाय कार्रवाई पर है। पुस्तक में जगह-जगह प्रासंगिक उद्धरण हैं। भाषा बहुत सरल और आकर्षक है। पुस्तक पढ़ने में आसान है और आपको पता ही नहीं चलता कि आप इसे कब पढ़ना शुरू करते हैं और कब खत्म करते हैं। पुस्तक में दिए गए व्यावहारिक और नवीन सुझाव इसे एक गतिविधि या कार्यपुस्तिका जैसा बनाते हैं। यह पुस्तक प्रेरणादायक है और इसे संग्रह में रखने और उपहार के रूप में देने लायक है। यह पुस्तक माता-पिता और शिक्षकों के लिए अपने बच्चों को पर्यावरणीय मुद्दों पर मार्गदर्शन देने के लिए उपयोगी है।

पृष्ठों की संख्या: ९२

पुस्तक अमेज़न पर उपलब्ध है।

लेखक के बारे में:

                  श्री. पारितोष तिरोडकर 

इस पुस्तक के लेखक श्री परितोष तिरोडकर ने ऑस्ट्रेलिया से फायनान्स क्षेत्र  में मास्टर्स डिग्री  प्राप्त की है।

श्री. तिरोडकर को कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, यूके और भारत में वित्त और लेखा परीक्षा क्षेत्रों में १२ वर्षों से अधिक का अनुभव है। श्री तिरोडकर ने टीडी बैंक, रॉयल बैंक ऑफ कनाडा, यूबीएस, ड्यूश बैंक और मॉर्गन स्टेनली जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ काम किया है।

पर्यावरण श्री तिरोडकर के दिल के करीब का विषय है।

अस्वीकरण:

यह ब्लॉग पोस्ट श्री परितोष तिरोडकर द्वारा लिखित पुस्तक The world is melting-how to talk to kids about climate change  ' पर आधारित है। ब्लॉग के लेखक इस पुस्तक पर किसी भी कॉपीराइट का दावा नहीं करते हैं। कॉपीराइट लेखक/प्रकाशक के पास है। पुस्तक में सामग्री के संदर्भ और चर्चा केवल शैक्षिक और मनोरंजन के उद्देश्यों के लिए हैं।

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Wednesday, August 6, 2025

आपली पृथ्वी आणि आपण


आपण अलिकडे हवामानातील बदल, पर्यावरणाचे रक्षण वगैरे विषयांबद्दल बरेच वाचतो आणि ऐकतो. पर्यावरणाचे रक्षण ही आपणा सर्वांची जबाबदारी आहे आणि त्यासाठी आपण सर्वांनी मिळून काम करणे अतिशय गरजेचे आहे. परंतु हे मुलांना कसे समजावून सांगणार, असा तुम्हाला प्रश्न पडला आहे का?

मग येथे श्री. पारितोष तिरोडकर तुमच्या मदतीला आले आहेत त्यांचे नवीन पुस्तक घेऊन. त्याचे नाव आहे The world is melting-how to talk to kids about climate change. काय सांगतात लेखक, चला आपण पाहू या.

१. तुमच्या मुलाला (किंवा मुलीला) हवामानातील बदलाबद्दल काय वाटते?

तुमचा मुलगा सर्व गोष्टींचे निरीक्षण करीत असतो.  हवामानातील बदल त्याच्या लक्षात येतात आणि तो प्रश्न विचारतो, 'अलिकडे एवढे गरम का होते? अजून पाऊस कसा आला नाही ?' 

२. सोप्या शब्दांत हवामान बदलाचे स्पष्टीकरण द्या

तुमचा मुलगा प्रश्न विचारतो आहे, याचा अर्थ तो या विषयावर विचार करतो आहे.

तेव्हा सर्वांत प्रथम मुलाचा  प्रश्न नीट ऐकून घ्या. म्हणजे त्याला काय म्हणायचे आहे ते तुमच्या लक्षात येईल.

मुलाला हवामान बदलाचे संपूर्ण विज्ञान माहित असणे आवश्यक नाही.तुमच्या मुलाचे वय असेल त्याप्रमाणे मुलाला स्पष्टीकरण द्या. 

मुलाचे वय जर ३-६ वर्षे असेल तर त्याला छानदार गोष्टीमधून स्पष्ट करा.  

मुलाचे वय ७-१० वर्षे असेल तर त्याला बऱ्यापैकी माहिती आहे. त्याला हवामान बदल कशामुळे होतो आहे, ते स्पष्ट करून सांगा. 

११-१४ वर्षे वयाच्या मुलाला या विषयावर अधिक खोलात जाऊन हवामान बदलाचा सर्व जगावर काय परिणाम होतो आहे ते तुम्हाला सांगता येईल. 

हवामान बदल हे संकट म्हणून नव्हे तर काळजीचे कारण म्हणून स्पष्ट करा. तुमचे उत्तर परिपूर्ण असणे आवश्यक नाही.  जास्त स्पष्टीकरण देऊ नका किंवा भयानक आकडेवारी देऊ नका.

मुलाला उगीच घाबरवून सोडू नका. ' आता आपले काही खरे नाही,' अशा स्वरूपाचे उत्तर टाळा. 'या परिस्थितीतून मार्ग काढण्यास पुष्कळ लोक काम करीत आहेत. आपल्यालासुद्धा काम करता येईल,' असे सांगा.

मुलगा अधिक प्रश्न विचारीत असेल तर त्याला प्रोत्साहन द्या.

आता मुलगा आपल्याला पर्यावरणाच्या रक्षणासाठी काय करता येईल असे विचारत असेल तर त्याला तुम्ही साधे सोपे उपाय सुचवू शकता.

३. पर्यावरणपूरक सवयी  

घरात चांगल्या सवयी लावणे आवश्यक आहे कारण मुले जे पाहतात त्यांचे ते अनुकरण करतात. साध्या सवयी म्हणजे ब्रश करताना नळ बंद करणे, खोलीतून बाहेर पडताना लाईट बंद करणे. 

मुलाला आणखी मोठेपणा दिलात की जसे, ' तू आजपासून लाइट चेकर, तू वॉटर मॅनेजर', तर तो आणखी प्रोत्साहित होईल. तुम्ही घरी काही उपक्रम राबवू शकता, जसे, इको संडे किंवा पर्यावरणस्नेही रविवार, कचरामुक्त मंगळवार. यामुळे घरात पर्यावरणस्नेही वातावरण तयार होईल. 

आपल्याकडे होळी, गणेशोत्सव, दिवाळी असे अनेक सण आहेत. अशा सणाच्या प्रसंगी  पर्यावरणपूरक रंग, गणेशमूर्ती इत्यादींचा वापर करा. 

अन्नाचा अपव्यय कमी करा, कंपोस्ट बिन सुरू करा, दिवे, पंखे आणि वापरात नसलेली उपकरणे बंद करा.

मुलाच्या  आवडीनिवडी पाहून नेचर जर्नलिंग, इमोशन कार्ड अशा गोष्टी मुलाला शिकवू शकता.  

उपदेश करणे, त्रास देणे किंवा अपराधीपणाची भावना निर्माण करणे या सर्वांमुळे क्वचितच बदल घडून येतो. याऐवजी तुमचे वर्तन तुम्ही आदर्श ठेवा. म्हणून जेव्हा मुले  तुमचा मुलगा तुम्हाला जुन्या पिशव्या पुन्हा वापरताना,  स्थानिक वनस्पती-आधारित अन्न निवडताना पाहील,  तेव्हा तो तुम्हाला आदर्श मानून  तुमच्याप्रमाणे वागण्याचा प्रयत्न करील. 

४. निसर्ग आणि प्राण्यांचा आदर  

जेव्हा  तुमचा मुलगा फूल न तोडता केवळ निरीक्षणात आनंद मानतो किंवा  भटक्या प्राण्याला न घाबरता मदत करतो, तेव्हा त्याच्या पाठीवर शाबासकीची थाप द्या.   

५. मोठ्या समस्या

प्रदूषण, जंगलतोड यांसारख्या समस्या अधिक मोठ्या आहेत.  त्यामुळे मुलाने त्याविषयी प्रश्न विचारल्यास तुमचे स्पष्टीकरण सोपे ठेवा. यावरसुद्धा उपाय आहे हे त्यांना पटवून द्या.  

६. व्यस्त, डिजिटल जगातही मुलाला पर्यावरणावर  विश्वास ठेवण्यास शिकवा 

आजच्या जलद, गोंगाटाच्या, निरनिराळ्या स्क्रीन्सनी व्यापलेल्या जगात मुलाला पर्यावरणावर विश्वास ठेवणे कसे शक्य आहे? तर मग असे करा या डिजिटल माध्यमांचाच उपयोग पर्यावरणाविषयी ज्ञान मिळवण्यासाठी करा.  उदाहरणार्थ, जेव्हा तुम्ही कारमध्ये असता तेव्हा तुम्ही पर्यावरणाविषयी पॉडकास्ट ऐकू शकता किंवा पर्यावरणाविषयी गप्पा मारू शकता. तुम्ही पर्यावरण या विषयावरील डॉक्युमेंटरीज पाहू शकता, गेम्स खेळू शकता.

७. कथा, चित्रपट या माध्यमांचा, त्यांतील नायकांचा उपयोग करा  

मुलांना हीरो वर्शिप आवडते. ते स्वत:ला एखाद्या हीरोच्या ठिकाणी मानून जगत असतात.‌आता कॉमिक्समधून, चित्रपटांतून असे बरेच क्लायमेट हीरोज किंवा वॉरियर्स लोकप्रिय करण्यात आले आहेत. पर्यावरण या विषयावर बरेच चित्रपट आहेत. तेव्हा मुलांना असे साहित्य वाचण्यास द्या किंवा असे चित्रपट पहा.

८. शाळा, मित्र, अशा समूहाचे महत्त्व 

तुमच्या मुलाचे जग घरीच थांबत नाही. ते शाळेच्या हॉलवे, खेळाचे मैदान, वाढदिवसाच्या पार्ट्या आणि व्हॉट्स ॲप ग्रुपमध्ये पसरते. शाळांमध्ये तुम्ही हरित प्रकल्पांना प्रोत्साहन देऊ शकता. पर्यावरणपूरक कल्पनांना प्रोत्साहन देण्यासाठी इतर मित्रांसोबत एकत्र येऊ शकता. वाढदिवसाच्या पार्ट्या अशा ठेवा की त्यातून कमीत कमी कचरा तयार होईल. 

९. माझा मुलगा ऐकत नाही , मी काय करू?
तुम्हाला असे वाटत असेल की माझा मुलगा ऐकत नाही, तर भावनिक दृष्ट्या त्याच्याशी अधिक संबंध प्रस्थापित करणे तुम्हाला जरुरीचे आहे. तुम्ही मुलासाठी अधिक वेळ द्या. तो ज्या गोष्टी करतो आहे, त्याबद्दल त्यांचे कौतुक करा, म्हणजे अधिक करण्याविषयी तो प्रोत्साहित होईल.

१०. हवामान आशावाद:

हवामान आशावाद हा असा विश्वास आहे की गोष्टी गंभीर असल्या तरी, लोक फरक करू शकतात आणि करत आहेत. मुलांना ते देखील फरक करू शकतात हे शिकवणे. म्हणून, मुलांना काय प्रभावी आहे ते अधोरेखित करा, जसे की उर्जेच्या गरजांसाठी सौर ऊर्जेचा वापर वाढवणे, झाडे लावण्याबद्दल जागरूकता.

११. पृथ्वीचे रक्षण:

या सर्व विवेचनावरून तुमच्या लक्षात आले असेल की पृथ्वीचे रक्षण करणे ही सर्वांची जबाबदारी आहे आणि केवळ अरिष्टातून पृथ्वी वाचवणे त्यासाठी पुरेसे नाही. ही जबाबदारी पार पाडण्यासाठी परिपूर्ण प्रयत्नाची गरज नाही. अपूर्ण प्रयत्नसुद्धा आपला परिणाम साधतोच.  तुमच्या मुलाला कळू द्या की पृथ्वीच्या रक्षणासाठी तो जे  करतो आहे,  ते खूप काही आहे. तुमचा मुलगा पृथ्वीमध्ये  फरक घडवत आहे,  पृथ्वीचे घडवत आहे - प्रेमाने आणि आशेने. पृथ्वीला आपल्याकडून एवढीच अपेक्षा  आहे.

पुस्तकाविषयी:
असे हे पुस्तक आपल्याला पर्यावरण रक्षण या विषयावर बरेच काही सांगून जाते. लेखकाचा सारा भर परिपूर्णतेचा आग्रह धरण्यापेक्षा प्रत्यक्ष कृती करण्यावर आहे. पुस्तकात जागोजागी समर्पक अशी उद्धरणे (quotations) आहेत. भाषा अतिशय सोपी आणि मनाला भिडणारी आहे. पुस्तकाचा आकार सुटसुटीत असून तुम्ही केव्हा पुस्तक वाचण्यास सुरुवात करता आणि केव्हा संपवता ते कळत नाही. पुस्तकातील प्रॅक्टिकल आणि अभिनव टिप्समुळे पुस्तकाला ॲक्टिव्हिटी  किंवा वर्क बुक सारखे स्वरूप आले आहे. पुस्तक प्रेरणादायी असून संग्रहात ठेवण्यायोग्य आणि भेट देण्यायोग्य आहे. पुस्तक पालकांना तसेच शिक्षकांना मुलांना पर्यावरणविषयक मार्गदर्शन करण्यास उपयुक्त आहे.
पृष्ठसंख्या: ९२.
पुस्तक अमेझॉनवर उपलब्ध आहे.

लेखकाविषयी:

                  श्री. पारितोष तिरोडकर 

या पुस्तकाचे लेखक श्री. पारितोष तिरोडकर यांनी ऑस्ट्रेलियामधून फायनान्समध्ये मास्टर्स डिग्री घेतली आहे.  

श्री. तिरोडकर यांना कॅनडा, ऑस्ट्रेलिया, यू के आणि भारत या देशांमध्ये  फायनान्स आणि ऑडिट या क्षेत्रांमध्ये काम करण्याचा १२ वर्षांहून अधिक काळाचा अनुभव आहे.श्री. तिरोडकर यांनी टीडी बँक, रॉयल बँक ऑफ कॅनडा, यूबीएस, ड्यूश बँक आणि मॉर्गन स्टॅनली अशा नामांकित संस्थांसोबत काम केले आहे. 

पर्यावरण हा श्री. तिरोडकरांच्या जिव्हाळ्याचा विषय आहे.

डिस्क्लेमर: 
श्री. पारितोष तिरोडकर  यांनी लिहिलेल्या ' द वर्ल्ड इज मेल्टिंग-हाऊ टू टॉक टू किड्स अबाऊट क्लायमेट चेंज'  या पुस्तकावर लिहिलेली ही ब्लॉग पोस्ट  आहे. ब्लॉगचा लेखक  पुस्तकावर कोणत्याही प्रकारच्या कॉपीराइटचा दावा करत नाही. कॉपीराइट लेखक/प्रकाशकाकडे आहे. पुस्तकातील संदर्भ आणि त्यातील आशयाची चर्चा केवळ शिक्षण आणि मनोरंजनासाठी आहे. 

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श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १५ – पुरुषोत्तमयोग

श्रीभगवान म्हणाले

आहे तो एक अव्यय पिंपळ | ज्याच्या शाखा खाली आणि वर मूळ || छंद हीच ज्याची पाने पुष्कळ | त्यास जो जाणतो, तो खरा जाणता || अ.१५, ओ.१||

विषयांनी पालवलेल्या, पोसलेल्या गुणांवर | शाखा त्याच्या पसरल्या खालीवर || मुळांचा झाला खाली विस्तार | कर्मापाठी बांधलेल्या मनुष्यलोकात- || अ.१५, ओ.२||

-उपलब्ध न होई या लोकात | त्याचे रूप, त्याची प्रतिष्ठा किंवा त्याचा आदि-अंत. || छेदून असंगशस्त्राने मजबूत | हा दृढमूल पिंपळ- || अ.१५, ओ.३||

-पोहचावे त्या पदाप्रत | जेथे गेलेले न येती परत- || -त्या आद्य पुरुषापर्यंत, | ज्यापासून पुरातन प्रवृत्ती प्रसवली. || अ.१५, ओ.४||

जे आहेत आसक्ती, अभिमान आणि मोहापासून विरक्त | झाले इच्छांतून निवृत्त, सुख-दु:खांच्या द्वंद्वातून मुक्त || असती नित्य अध्यात्मात रत | ते ज्ञानी जातात त्या पदास || अ.१५, ओ.५||

सूर्य, चंद्र व अग्नीच्या तेजात | न होई जे  प्रकाशित || जेथे जाऊन न येती परत | ते माझे परम धाम || अ.१५, ओ.६||

जीवलोकातील जीवभूत | आहे माझाच अंश शाश्वत || परी तो होतो आकर्षित | प्रकृतिस्थित मनासहित सहा इंद्रियांस || अ.१५, ओ.७ ||

जीवभूत जेव्हा शरीर मिळवतो | किंवा शरीर सोडून जातो || तेव्हा मन आणि इंद्रियांस सोबत नेतो | जसा वायू गंधांस नेतो उगमापासून || अ.१५, ओ.८||

श्रोत्र, स्पर्शेंद्रिय आणि नयन | रसना, घ्राणेंद्रिय आणि मन || यांत करून अधिष्ठान | जीवभूत विषय उपभोगतो || अ.१५, ओ.९||

हा जीवभूत दिसत नाही मूढांना | तो दिसतो ज्ञानचक्षूंना || स्थितीत असताना, उपभोग घेताना | गुणांपाठी जाताना आणि शरीर सोडून जाताना || अ. १५, ओ.१०||

योगी प्रयत्नरत | पाहती अंतरातील जीवभूत ||नाही तो दिसत | आत्म्यास न जाणणाऱ्या बुद्धिहीनांस || अ.१५, ओ.११||

जे प्रकाशित करते जगत अखिल | ते तेज आदित्यातील || तसेच चंद्र आणि अग्नीतील | तेज माझेच जाण || अ.१५, ओ. १२||

भूमीत मी शिरून | माझ्या ओजाने करतो भूतांस धारण || औषधींचे करतो पोषण | होऊन सोम रसात्मक || अ.१५, ओ.१३||

मी वैश्वानर रूपात | प्राण्यांच्या देहात आश्रित ||प्राण आणि अपानाने युक्त | पचवितो चतुर्विध अन्नास || अ.१५, ओ.१४||

मी सर्वांच्या हृदयांत करतो वास | उपजवितो स्मृती, ज्ञान, विस्मृतीस || मी योग्य, वेदांनी जाणण्यास | वेदांचा कर्ता आणि वेद जाणणारा मीच || अ.१५, ओ.१५||

दोन पुरुष या लोकांत | त्यांना क्षर आणि अक्षर म्हणतात || सारी भूते क्षर आहेत | कूटस्थ आहे अक्षर || अ.१५, ओ.१६||

उत्तम पुरुष आहे याहून | जो ओळखला जातो परमात्मा म्हणून || त्रैलोक्यात शिरून करतो पोषण | तो अव्यय ईश्वर || अ.१५, ओ.१७||

अक्षरापलीकडे माझे स्थान | मी उत्तम अक्षराहून || मी ओळखला जातो पुरुषोत्तम म्हणून | लोकांत आणि वेदांत || अ.१५, ओ.१८||

मला जाणतो जो ज्ञानी | पुरुषोत्तम म्हणुनी || तो अनन्य होउनी | मला भजतो भारता || अ. १५, ओ.१९||

असे हे शास्त्र अतिगहन | अनघा, केले तुला कथन || ते जाणून बुद्धिमान | कृतकृत्त्य होवो भारता || अ.१५, ओ.२०||

असा हा श्रीमद्भगवद्गीता या उपनिषदातील ब्रह्मविद्यांतर्गत योगशास्त्रामधील श्रीकृष्ण आणि अर्जुन यांच्या संवादातील ‘पुरुषोत्तमयोग’ नावाचा पंधरावा अध्याय पूर्ण झाला

                 || श्रीकृष्णार्पणमस्तु ||

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Tuesday, August 5, 2025

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १४ – गुणत्रयविभागयोग

श्रीभगवान म्हणाले

ज्ञानातील उत्तम ज्ञान | पुन्हा करतो कथन || मुनी ज्यास जाणून | गेले परम सिद्धीस || अ.१४, ओ.१||

या ज्ञानाचा आश्रय घेऊन | जे झाले माझ्या समान || उत्पत्तिसमयीही न होती उत्पन्न | प्रलयात न होती व्यथित || अ.१४, ओ.२||

भारता, हे ब्रह्म महान | माझ्यासाठी योनिस्थान ||गर्भ त्यात स्थापून | मी निर्मितो भूतांस || अ.१४, ओ. ३||

कौंतेया, सर्व योनींतून | मूर्ती ज्या होती उत्पन्न ||ब्रह्म हेच त्यांचे महान योनिस्थान | बीजदाता मी पिता || अ.१४, ओ.४||

सत्त्व, रज, तम गुण | प्रकृतीपासून होऊन उत्पन्न || देहात टाकती बांधून | अव्यय आत्म्यास महाबाहो || अ.४, ओ.५||

त्यांत निर्मळ सत्त्वगुण | प्रकाशदायी दोषहीन ||तरी सुख आणि ज्ञानाच्या ओढीतून | अनघा, तोही जीवास बांधतो || अ.१४, ओ.६||

रजोगुण जन्मतो इच्छांतून | तृष्णा आणि भोगांतून || कर्माच्या आसक्तीतून | जीवास बांधतो कौंतेया || अ.१४, ओ. ७||

तमोगुण जन्मतो अज्ञानातून | जीवांस मोहात टाकून || प्रमाद, आळस, निद्रा यांतून | जीवास बांधतो भारता || अ.१४, ओ.८||

सत्त्वगुण बांधतो सुखात | रजोगुण बांधतो कर्मात || तमोगुण बांधतो प्रमादात | झाकून ज्ञानास || अ.१४, ओ.९||

कधी सत्त्व, रज आणि तमावर | कधी रज, सत्त्व आणि तमावर || कधी तम, रज आणि सत्त्वावर | मात करती भारता || अ.१४, ओ.१०|| 

जेव्हा देहाच्या सर्व द्वारांतून | ज्ञानाचा प्रकाश येतो उजळून || तेव्हा वाढला सत्त्वगुण | असे म्हणती || अ.१४, ओ.११||

रजोगुणाची होता उत्पत्ती | अनियंत्रित कर्माकडे वळे प्रवृत्ती || लोभ सुटे, इच्छा होती | हे भरतर्षभा || अ.१४, ओ.१२||

तमोगुण वाढता | दाटे अज्ञानाचा अंधःकार, येई निष्क्रियता || घडती प्रमाद, मोह होई चित्ता | जाण कुरुनंदना || अ.१४, ओ.१३||

सत्त्वगुणाच्या प्रभावात | होतो ज्याचा देहपात ||त्यास होतो प्राप्त | ज्ञानी जनांचा निर्मल लोक || अ.१४, ओ१४||

रजोगुणात होता देहपात | जन्म मिळे कर्मासक्त लोकांत || होता देहपात तमोगुणात | मूढ योनीत होई जन्म  || अ.१४, ओ.१५||

सात्त्विक, निर्मळ - सत्कर्मास | दु:ख - राजसी कर्मास || अज्ञान - तामसी कर्मास | अशी कर्माची फळे प्राप्त होती || अ.१४, ओ.१६||

सत्त्वगुणातून ज्ञान | लोभ रजोगुणातून ||तमोगुणातून प्रमाद, मोह आणि अज्ञान | उत्पन्न होतात || अ.१४, ओ.१७||

सत्त्वस्थांस मिळे ऊर्ध्वगती | राजस मध्येच थांबती || अधोगतीस जाती | हीनवृत्तीचे तामसी || अ.१४, ओ.१८||

ज्यास होते ज्ञान | की सर्व काही करवितात गुण ||तो गुणांपलीकडील परास जाणून | माझ्या भावास पोहचतो || अ.१४, ओ.१९||

देहापासून उत्पन्न होणारे हे तीन गुण | जेव्हा देही जातो ओलांडून || तेव्हा तो जन्म, मृत्यू, म्हातारपण यांच्या दु:खातून | मुक्त होऊन अमृत मिळवतो || अ.१४, ओ.२०||

अर्जुन म्हणाला

ज्याने केले या गुणांस पार | प्रभो, काय त्याची लक्षणे, कसा त्याचा आचार || कथन मला कर | कसा तो तीन गुणांस पार करतो || अ.१४, ओ.२१||

श्रीभगवान म्हणाले

प्रवृत्ती, मोह आणि ज्ञानाचा प्रकाश | यांचा जो न धरी अभिलाष || नच करी द्वेष | ते उत्पन्न होता पांडवा- || अ.१४, ओ.२२||

-जो तटस्थ राहुनी | न विचलित होई गुणांनी || गुण वर्तती आपल्या स्थानी | हे जाणून क्षोभ न पावतो- || अ.१४, ओ.२३||

-सुख आणि दु:ख समान | एकच माती, दगड आणि कांचन || सारखे प्रिय-अप्रिय, निंदा-स्तवन | ज्या धैर्यवान पुरुषास- || अ.२४, ओ.२४||

-सारखे ज्यास मान-अपमान | मित्र-शत्रू ज्यास समान || सकाम कर्मांचा आरंभ दिला त्यागून | त्यास गुणातीत म्हणतात || अ.२४, ओ.२५||

जो निष्ठा आणि भक्तियोग अवलंबतो | आणि माझी सेवा करतो || तो गुणांस उल्लंघतो | आणि पावतो ब्रह्मपदास || अ.१४, ओ.२६||

अमृताचे, अव्ययाचे, | शाश्वत धर्माचे || आणि ब्रह्मस्वरूपाचे | अंतिम निधान आहे मी || अ.१४, ओ.२७||

असा हा श्रीमद्भगवद्गीता या उपनिषदातील ब्रह्मविद्यांतर्गत योगशास्त्रामधील श्रीकृष्ण आणि अर्जुन यांच्या संवादातील ‘गुणत्रयविभागयोग’ नावाचा चौदावा अध्याय पूर्ण झाला

                || श्रीकृष्णार्पणमस्तु ||

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Monday, August 4, 2025

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय १३-क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

अर्जुन म्हणाला

काय आहे पुरुष आणि प्रकृती | क्षेत्र काय, क्षेत्रज्ञ कोणास म्हणती || ज्ञान आणि ज्ञेयात फरक कसा करती | केशवा, हे जाणू इच्छितो || अ.१३, ओ.१||

श्रीभगवान म्हणाले

क्षेत्र म्हणती या शरीरास I आणि जो जाणतो क्षेत्रास II विद्वान त्यास I क्षेत्रज्ञ म्हणती कौंतेया II अ. १३, ओ.२II

क्षेत्रांचा संपूर्ण | मी क्षेत्रज्ञ आहे जाण || क्षेत्र आणि क्षेत्रज्ञाचे ज्ञान | खरे ज्ञान भारता || अ.१३, ओ.३||

क्षेत्र, जे आणि जसे असते | ज्यातून जसे बदलते || तो कोण ज्याच्यामुळे प्रभावित होते | ते थोडक्यात सांगतो || अ.१३, ओ.४||

हे ज्ञान निरनिराळ्या छंदांतून | ब्रह्मसूत्रपदांतून ||निश्चित कार्यकारणभावांतून | विविध ऋषींनी गाइले || अ.१३, ओ.५||

पंचमहाभूते आणि अहंकाराचा | बुद्धी आणि अव्यक्ताचा || अकरा इंद्रियांचा | आणि पाच इंद्रियविषयांचा- || अ.१३, ओ.६||

-इच्छा आणि द्वेषाचा I सुख आणि दु:खाचा II चेतना आणि धैर्याचा I समावेश क्षेत्रात II अ. १३, ओ. ७ II

विनम्रता आणि अदांभिकतेचा | अहिंसा, सहनशीलता आणि सरळपणाचा || आचार्यांची उपासना आणि शुद्धतेचा | स्थैर्य आणि आत्मनिग्रहाचा- || अ.१३, ओ.८||

-इंद्रियविषयांच्या त्यागाचा | वैराग्य आणि निरहंकाराचा || दु:खदोष जाणण्याचा | जन्म, मृत्यू, वृद्धता आणि व्याधी हाच- || अ.१३, ओ.९||

-पुत्र, पत्नी, घर इत्यादीविषयी अनासक्तीचा | आणि असंगाचा || सदैव समचित्त असण्याचा | इष्ट आणि अनिष्टाविषयी- || अ.१३, ओ.१०||

-माझ्यावर अनन्यभावाचा | आणि अढळ भक्तीचा || एकांत ठिकाणी राहण्याचा | सामान्य जनांत रुची नसण्याचा- || अ. १३, ओ.११||

-अध्यात्मज्ञान शाश्वत मानण्याचा | तत्त्वज्ञानाचा अभ्यास करण्याचा || न इतर कशाचा | समावेश खऱ्या ज्ञानात || अ.१३, ओ.१२||

सांगतो आता ज्ञेय काय ते | ज्याच्या ज्ञानाने अमृतप्राप्ती होते || न सत् न असत् बोलले जाते | ते अनादि श्रेष्ठ ब्रह्म || अ.१३, ओ.१३||

हात, पाय आणि नेत्र | शिरे, मुखे आणि श्रोत्र ||आहेत त्यास सर्वत्र | सर्वांस व्यापून आहे ते || अ.१३, ओ.१४||

त्यात होई सर्व गुणांचा भास | जरी नाहीत इंद्रिये त्यास || अनासक्त ते पोसते सर्वांस | निर्गुण असून गुणांस भोगते || अ.१३, ओ. १५||

ते वसते भूतांच्या आत आणि बाहेर | आहे चर आणि अचर || सूक्ष्म असल्याने जाणण्यास दुस्तर | आहे जवळही आणि दूरही || अ.१३, ओ. १६||

भूतांत अविभक्तपणे असते | जरी जीवांत विभक्त भासते || जरी भूतांस पोसते | तरी त्यांस ग्रासते आणि पुन्हा निर्मिते || अ.१३, ओ.१७||

ते तेज तेजांमधील | आहे अंधाराच्या पैल || ज्ञान, ज्ञेय, ज्ञानगम्य, अखिल- | -जीवांच्या हृदयात वसते || अ.१३, ओ.१८||

असे मी तुला थोडक्यात केले कथन | काय क्षेत्र, काय ज्ञेय, काय ज्ञान || माझा भक्त हे जाणून | माझ्या भावास पोहचतो || अ.१३, ओ.१९||

पुरुष आणि प्रकृती | दोन्ही अनादि असती ||विकार आणि गुण उद्भवती | प्रकृतीपासून || अ.१३, ओ.२०||

कार्य आणि कारण | उद्भवतात प्रकृतीपासून ||पुरुष करतो निर्माण | सुख-दु:खाचा भोग || अ.१३, ओ.२१||

प्रकृतीत करून वास | पुरुष भोगतो प्रकृतीच्या गुणांस || आणि पावतो सत्-असत् योनीस | गुणसंगाकारणे || अ.१३, ओ.२२||

या देहात श्रेष्ठ पुरुष राहतो | तो महान ईश्वर आहे, परमात्मा म्हटला जातो || जो जवळून पाहतो, अनुमती देतो | करतो पोषण, घेतो भोग || अ.१३, ओ.२३||

ज्यास आहे ज्ञात | पुरुष आणि प्रकृती, त्यांच्या गुणांसहित || तो सर्वथा राहूनही कार्यान्वित | पुन्हा जन्मास न येतो || अ.१३, ओ.२४||

कुणी पाहती ध्यानाने | कुणी पाहती सांख्य-योगाने || इतर पाहती कर्म-योगाने | आत्म्याने आत्म्यास आत्म्यात || अ.१३, ओ.२५||

काही जाणते नसून | उपासना करती इतरांचे ऐकून || तेही मृत्यूस जाती ओलांडून | श्रुतिपरायण || अ.१३, ओ.२६||

स्थावर-जंगम होते निर्माण | क्षेत्र आणि क्षेत्रज्ञाच्या संयोगातून || हे घे जाणून | भरतर्षभा || अ.१३, ओ.२७||

सर्व विनाशी भूतांस समान | अविनाशी परमेश्वर आहे व्यापून || ज्यास येते असे दिसून | त्यास खरे दिसते || अ.१३, ओ.२८||

जो पाहतो त्या परमेश्वरास | समत्वाने व्यापणाऱ्या सर्वांस || तो न जाई अधोगतीस | परम गतीस पावतो || अ.१३, ओ.२९||

प्रकृती करविते कर्मांस | ही जाण आहे ज्यास ||तो जाणतो अकर्त्या आत्म्यास | यथार्थपणे || अ.१३, ओ.३०||

जेव्हा भूतांत भिन्न | येई एकच आत्मा दिसून ||त्याचाच हा विस्तार, हे होई ज्ञान | तेव्हा ब्रह्म प्राप्त होते || अ.१३, ओ.३१||

परमात्मा अनादि आणि निर्गुण | असल्याने अव्यय जाण || कौंतेया, तो शरीरात राहून | न काही करतो, न कशात गुंततो || अ.१३, ओ.३२||

अलिप्त राहतो, जसे राहून सर्वांत | सूक्ष्म असल्याने आकाश न होते लिप्त || तसा सर्वत्र राहून देहात | आत्मा अलिप्त राहतो || अ.१३, ओ.३३||

रवी एकच आकाशात | उजळतो सारे जगत ||तसा क्षेत्री प्रकाशित | क्षेत्रास करतो भारता || अ. १३, ओ.३४||

जे ज्ञानचक्षूंनी जाणती | क्षेत्र आणि क्षेत्रज्ञाची भिन्न स्थिती || ते भूत आणि प्रकृतीपासून मोक्ष जाणती | जाती परम गतीस || अ.१३, ओ.३५||

असा हा श्रीमद्भगवद्गीता या उपनिषदातील ब्रह्मविद्यांतर्गत योगशास्त्रामधील श्रीकृष्ण आणि अर्जुन यांच्या संवादातील ‘क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग’ नावाचा तेरावा अध्याय पूर्ण झाला

              || श्रीकृष्णार्पणमस्तु ||

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Friday, August 1, 2025

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय १२-भक्तियोग

अर्जुन म्हणाला

याप्रमाणे जे भक्त तुला भजतात | होऊन सतत भक्तियुक्त || आणि जे भजतात अक्षर अव्यक्त | त्यांतील योगज्ञानी कोण || अ.१२, ओ.१ ||

श्रीभगवान म्हणाले

मन स्थिर करून माझ्यात | होऊन दिव्य श्रद्धेने युक्त || जे नित्य मला भजतात | ते सर्वांत योग्य वाटतात मला || अ.१२, ओ.२||

परंतु जे अक्षर, अनिर्देश्य, अव्यक्ताची | सर्वत्रगम, अचिंत्याची || कूटस्थ, अचल, ध्रुवाची | करतात  उपासना- || अ.१२, ओ.३||

-इंद्रियांचे संयमन करून | सर्वत्र समबुद्धी ठेवून ||सर्व भूतांच्या हिताशी समरस होऊन | तेही मलाच मिळतात || अ. १२, ओ.४||

अव्यक्तात ज्यांची बुद्धी आसक्त | ते अधिक क्लेश भोगतात || देहवंतास अव्यक्त | कष्टाने प्राप्त होते || अ.११, ओ.५||

परंतु जे सर्व कर्मे मला अर्पितात | माझ्याशी परायण होतात || आणि माझे ध्यान करून उपासना करतात | अनन्य योगाने- || अ.१२, ओ.६||

-त्यांना मी त्वरित नेतो उद्धरून | मृत्युसंसारसागरातून | स्थिर केले मन | ज्यांनी माझ्यात || अ.१२, ओ. ७||

माझ्यात स्थिर कर मनास | माझ्यात नियुक्त कर बुद्वीस || त्यायोगे करशील वास | माझ्यात नि:संशय || अ.१२, ओ.८||

मन स्थिर करणे माझ्यात | जर नसेल शक्य होत || तर मला कर प्राप्त | अभ्यासयोगाने धनंजया || अ. १२, ओ.९||

अभ्यासही नसेल साधत | तर परायण हो कर्मात || सिद्धी करशील प्राप्त | कर्मे करून माझ्यासाठी || अ.१२, ओ.१०||

माझ्यासाठी कर्म करण्यास | जर असमर्थ असलास || तर त्याग सर्व कर्मांच्या फळास | आणि हो आत्मवान || अ.१२, ओ.११|| 

अभ्यासापेक्षा बरे ज्ञान | ज्ञानाहून चांगले ध्यान ||कर्मफलत्याग श्रेष्ठ ध्यानाहून | त्या त्यागातून मिळे शांती || अ. १२, ओ.१२||

जो द्वेष न करी सर्व भूतांचा | आहे कृपाळू मित्र त्यांचा || आहे निर्मम, स्पर्श न ज्यास अहंकाराचा | सुखदु:खांप्रति मानतो समभाव || अ.१२, ओ.१३||

जो संतुष्ट आहे, साधतो योग सतत | जो दृढनिश्चयी आहे, आत्म्यास करतो संयमित || जो मन आणि बुद्धीने आहे मला अर्पित | तो भक्त मला प्रिय आहे || अ.१२, ओ.१४||

लोकांना जो उद्वेग न देतो | लोकांमुळे जो न उद्विग्न होतो || हर्ष, दु:ख, भय, उद्वेग यांपासून मुक्त तो | मला प्रिय आहे || अ.१२, ओ.१५||

निरपेक्ष, दक्ष, शुचिर्भूत | उदासीन, होई न व्यथित || सर्व प्रयासांपासून मुक्त | असा भक्त मला प्रिय आहे || अ.१२, ओ.१६||

ज्यास न होई हर्ष, जो न करी द्वेषास | नाही ज्यास इच्छा, न होई दु:ख ज्यास || त्यागिले ज्याने शुभ आणि अशुभास | तो भक्त मला प्रिय आहे || अ.१२, ओ.१७||

शत्रू आणि मित्र ज्यास समान | त्याचप्रमाणे मान आणि अपमान || शीतता वा उष्णतामान | आणि संग ज्याने सोडिला || अ. १२, ओ.१८||

निंदा-स्तुति ज्यास समान, जो राखतो मौन | मिळेल त्यात मानतो समाधान || ज्याचे न घर, आहे स्थिरमती, भक्तिमान | तो नर प्रिय मला || अ.१२, ओ.१९||

हे धर्मामृत | सांगितल्याप्रमाणे आचरतात || ते श्रद्धावान, माझ्याशी परायण भक्त | अतिशय प्रिय मला || अ.१२, ओ.२०||

असा हा श्रीमद्भगवद्गीता या उपनिषदातील ब्रह्मविद्यांतर्गत योगशास्त्रामधील श्रीकृष्ण आणि अर्जुन यांच्या संवादातील ‘भक्तियोग ’ नावाचा बारावा अध्याय पूर्ण झाला.

                || श्रीकृष्णार्पणमस्तु ||

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Thursday, July 31, 2025

श्रीमद्भगवद्गीता - अध्याय ११ – विश्वरूपदर्शनयोग

अर्जुन म्हणाला

माझ्यावर कृपा करून | केलेस तू कथन || गूढ अध्यात्मज्ञान | त्याने मोह दूर झाला || अ.११, ओ.१||

विस्ताराने केले कथनास | भूतांच्या उत्पत्ती तसेच लयास  || आणि तुझ्या अव्यय माहात्म्यास | हे कमलपत्राक्षा || अ.११, ओ.२||

परमेश्वरा, तू जसे वर्णिले स्वत:स | तसाच मला दिसतोस || परंतु तुझ्या ऐश्वर रूपास | पाहण्या मी इच्छितो  || अ. ११, ओ.३||

प्रभो, तुझे रूप पाहण्याला | जर वाटतो मी योग्य तुला || तर तुझे अव्यय रूप मला | दाखवावे योगेश्वरा || अ. ११, ओ. ४ ||

श्रीभगवान म्हणाले

शेकड्यांत आणि सहस्रांत | नानाविध प्रकारांत ||नानाविध रंगांत आणि आकारांत | पार्था, माझी दिव्य रूपे पहा || अ.१, ओ.५||

आदित्यांना, वसूंना, रुद्रांना | अश्विनीकुमारांना आणि मरुद्गणांना || तसेच पूर्वी न पाहिलेल्या आश्चर्यांना | पाहून घे भारता || अ.१, ओ.६||

गुडाकेशा, देहात माझ्या | पहा चराचर जगास साऱ्या || इच्छितोस आणखी जे पाहण्या | तेही घे पाहून || अ.१, ओ.७ ||

चक्षूंनी स्वत:च्या | समर्थ नाहीस तू पाहण्या ||माझा ऐश्वर योग पाहण्या | दिव्य चक्षू देतो तुला || अ.१, ओ.८||

संजय म्हणाला 

हे राजा, तेव्हा असे बोलुनी | महायोगेश्वर हरींनी ||पार्थास दिले दाखवुनी | परम ऐश्वर रूप || अ.११, ओ.९||

अनेक मुखे, अनेक नयनांनी युक्त | अनेक दर्शनांनी युक्त || अनेक आभरणांनी अलंकृत | अनेक दिव्य आयुधांनी सिद्ध- || अ.११, ओ.१०||

-दिव्य माळा आणि वस्त्रांनी युक्त | लावून उटणे दिव्य सुगंधित || देव आश्चर्यकारक अत्यंत | अनंत विश्वव्यापक || अ.११, ओ. ११||

प्रकटता सहस्र सूर्य आकाशात | जे तेज दिसून येत || तशा तेजाने तळपत | होता तो महात्मा || अ.११, ओ.१२||

तेव्हा पांडवाने पाहिले सारे जगत | जे विभागले अनेक भागात || त्या देवांच्या देवाच्या शरीरात | एकाच ठिकाणी || अ.११, ओ.१३||

तेव्हा धनंजय होऊन विस्मित | आणि रोमांचित ||बोलला जोडून हात | नमवून शिरास || अ.११, ओ.१४||

अर्जुन म्हणाला 

सर्व देवांचे आणि भूतांचे | कमलासनस्थ ब्रह्मदेवाचे || ऋषींचे आणि दिव्य नागांचे | देवा, तुझ्या देहात दर्शन होते || अ.११, ओ.१५||

अनेक नेत्र, मुखे, उदर आणि हात | दिसतात तुझ्या सर्वव्यापी अनंत रूपात || परी दिसे न तुझा आदि, मध्य किंवा अंत | हे विश्वेश्वरा, विश्वरूपा || अ. ११, ओ.१६||

किरीट, गदा आणि चक्र धारण करणारा |दीप्तिमान, तेजाने तळपणारा || प्रज्वलित अग्नी किंवा सूर्यासम प्रकाशणारा | तुला पाहणे कठीण || अ.११, ओ.१७ ||

तू अक्षर, श्रेष्ठ, योग्य जाणण्यास | तू श्रेष्ठ आधार या विश्वास || तू अव्यय, रक्षितोस शाश्वत धर्मास | तू सनातन पुरुष मला वाटतोस || अ. ११, ओ. १८ ||

आदि, मध्य आणि अंत नसणारा | अनंतवीर्य, अनंतबाहू, चंद्रसूर्य हेच नेत्र असणारा | प्रदीप्त अग्नीने युक्त मुख असणारा | स्वतेजाने या विश्वास तप्त करणारा दिसतोस || अ.११, ओ.१९||

व्यापलेस अंतर आकाश आणि पृथ्वीमधील | तू व्यापिल्यास दिशा सकल || महात्म्या, त्रैलोक्य झाले व्याकुल | अद्भुत, उग्र रूप तुझे पाहून || अ.११, ओ.२०||

सुरसंघ तुझ्यात प्रवेश करती | काही भीतीने हात जोडून स्तवन करती || महर्षी आणि सिद्ध 'स्वस्ति' म्हणती | आणि करती स्तुती तुझी || अ.११, ओ.२१||

रुद्र, वसू आणि भास्कर | विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुद्गण आणि पितर || गंधर्व, यक्ष, सिद्ध आणि असुर | विस्मयाने पाहती तुला || अ.११, ओ. २२||

हे महाबाहो, रूप तुझे विशाल | ज्यास आहेत मुखे, नेत्र, बाहू, मांड्या आणि पाय पुष्कळ | अनेक उदर आणि दाढांमुळे जे दिसते कराल | पाहून लोक आणि मीही झालो व्याकुळ || अ. ११, ओ. २३||

तू नभास स्पर्शतोस, तुझे तेजस्वी वर्ण बहुत | तू वासलेस मुख, तुझे विशाल नेत्र प्रदीप्त || तुला पाहून अंतरी झालो व्यथित | हे विष्णो, मला न धैर्य, न शांती || अ.११, ओ.२४||

कालाग्नीच्या समान | कराल दाढा असलेली तुमची मुखे पाहून || न वाटते सुरक्षित, न राहिले दिशांचे भान | देवेशा, जगन्निवासा, प्रसन्न हो || अ.११, ओ.२५ ||

हे धृतराष्ट्राचे सुत | साऱ्या राजांच्या सहित | भीष्म, द्रोण, सूतपुत्र उपस्थित | आणि आमचेही मुख्य योद्धे- || अ. ११, ओ.२६ ||

-भयानक कराल दाढांनी युक्त | तुमच्या मुखांत त्वरेने शिरतात | काहींची मस्तके अडकून दाढांत | चुराडा झालेली दिसती || अ . ११, ओ. २७||

जसे नदीचे प्रवाह वेगात | समुद्राच्या दिशेने वाहतात || तसे हे नरवीर होऊन प्रज्वलित | तुझ्या मुखांत प्रवेश करतात || अ.११, ओ.२८|| 

जसे पतंग वेगात | नाश पावण्या शिरतात प्रदीप्त अग्नीत || तसे लोक तुझ्या मुखांत वेगात शिरतात | नाश पावण्या || अ.११, ओ.२९||

तुझ्या जळत्या मुखांनी | सर्व लोकांस गिळत आहेस चाटुनी || विष्णो, तुझे तेज सारे जग व्यापुनी | उग्र किरण जगास ताप देती || अ. ११, ओ. ३०||

उग्ररूप आपण कोण ते करावे कथन | देववरा, प्रसन्न व्हा, मी करतो नमन || तुम्हास जाणू इच्छितो, तुम्ही आदिकारण | प्रवृत्त कशास मी न जाणतो || अ.११, ओ.३१||

श्रीभगवान म्हणाले

लोकांचा क्षय करणारा मी काळ थोर | प्रवृत्त आहे करण्या लोकांचा संहार || नाश पावतील हे सारे वीर | केवळ तुझ्याशिवाय || अ.११, ओ.३२||

तेव्हा ऊठ, मिळव यशास | समृद्ध राज्य उपभोग, जिंकून शत्रूंस || मीच मारले पूर्वी या सर्वांस | हे सव्यसाची, तू निमित्तमात्र हो || अ.११, ओ.३३||

द्रोण, भीष्म आणि जयद्रथ यांस | कर्ण तसेच अन्य वीरांस || मी मारले आहे, तू व्यथित न होता मार त्यांस | शत्रूंवर विजय मिळवशील || अ.११, ओ.३४||

संजय म्हणाला 

केशवाचे हे वचन ऐकून | हात जोडलेला, थरथर कापणारा अर्जुन || अत्यंत भ्यालेला, सद्गदित होऊन | कृष्णास असे बोलला || अ. ११, ओ. ३५ ||

अर्जुन म्हणाला

हृषीकेशा, ऐकून तुझ्या कीर्तीस | आनंद होतो साऱ्या जगास || राक्षस भिऊन धावती सर्व दिशांस | सारे सिद्ध नमन करती || अ. ११, ओ. ३६ ||

का करू नये त्यांनी नमन तुम्हास | ब्रह्मदेवाहून श्रेष्ठ आदिकर्त्यास || तुम्ही अनंत, देवेश, जगन्निवास | अक्षर, सत् आणि असत् च्या पलीकडे || अ.११, ओ.३७||

तुम्ही पुराणपुरुष, देव आद्य | या विश्वास परम आश्रय || जाणते आणि जाणण्यास योग्य | व्यापिले विश्व अनंतरूपाने || अ.११, ओ.३८||

तुम्ही वायू, यम, अग्नी, शशांक आणि वरुण | तुम्ही प्रजापती, पितामह महान || तुम्हास सहस्रवार नमन | पुन्हा पुन्हा नमस्कार असो || अ.११, ओ.३९||

नमस्कार तुला पुढून आणि पाठून | सर्व बाजूंनी तुला नमन || अनंतवीर्य आणि अमितविक्रम असे तुझे महिमान | व्यापतोस सर्व म्हणून सर्व तूच || अ. ११, ओ.४०||

अनादराने जे बोललो तुला मित्र मानून | `हे कृष्णा, हे यादवा, हे मित्रा' असे केले संबोधन ||तुझा महिमा न जाणून | मी तुला चुकीने किंवा प्रेमाने || अ.११, ओ.४१||

अपमान केला तुझा थट्टामस्करीत | असता फिरत, निजत, बसत किंवा भोजन करीत || अच्युता, तुझ्यासमोर किंवा एकांतात | त्या सर्वांची मला क्षमा कर || अ. ११, ओ.४२||

तू पिता या चराचराचा | आहेस श्रेष्ठ गुरू त्याचा ||त्रैलोक्यात नाही कुणी तुझ्या बरोबरीचा  | मग श्रेष्ठ कसा असेल || अ.११, ओ. ४३||

तेव्हा करून साष्टांग नमन | पूजनीय तुम्हास प्रार्थितो,  ‘होऊन प्रसन्न || करावे माझे अपराध सहन | जसे पित्याने पुत्राचे, मित्राने मित्राचे आणि प्रियकराने प्रियेचे’ || अ.११, ओ.४४||

पूर्वी न पाहिलेले तुझे रूप पाहून | झालो आनंदित तरी व्यथित आहे माझे मन || तेव्हा तुझ्या नेहमीच्या रूपात दे दर्शन | देवेशा, जगन्निवासा, प्रसन्न होऊन || अ.११, ओ.४५||

किरीट, गदा आणि चक्र धारण केलेल्या | तुझ्या रूपास इच्छितो पाहण्या || दर्शन दे चतुर्भुज रूपातच त्या | हे सहस्रबाहो, विश्वमूर्ते || अ. ११, ओ. ४६||

श्रीभगवान म्हणाले

अर्जुना, मी प्रसन्न  होऊन | आत्मयोगाने दिले माझ्या परम रूपाचे दर्शन || पूर्वी कुणी न पाहिले तुझ्यावाचून | हे तेजोमय अनंत आद्य विश्व || अ. ११, ओ. ४७||

न वेदयज्ञाने, न अध्ययनाने, न दानाने | न क्रियाकर्माने, न उग्र तपाने || मनुष्यलोकात अन्य कुणाला हे रूप पाहणे | शक्य नाही कुरुप्रवीरा || अ.११, ओ.४८||

माझे असे घोर रूप पाहून | नको  होऊस व्यथित किंवा भ्रांतमन || पहा प्रसन्न चित्ताने भयमुक्त होऊन | पूर्वीचेच माझे रूप || अ.११, ओ.४९||

संजय म्हणाला

असे बोलून अर्जुनास | भ्यालेल्या त्यास || दाखवून स्वत:च्या पूर्वीच्या सौम्य रूपास | वासुदेवाने आश्वासित केले || अ.११, ओ.५०||

अर्जुन म्हणाला 

जनार्दना, तुझ्या | सौम्य मानवी रूपास पाहुनिया || पूर्वस्थितीस येऊनिया | माझे मन स्थिर झाले || अ.११, ओ.५१||

श्रीभगवान म्हणाले 

माझ्या ज्या रूपास | आता तू पाहिलेस || इच्छा असते देवांस | रूप ते पाहण्याची || अ.११, ओ.५२||

न वेदाभ्यासाने, न तपाने | न दानाने, न यज्ञाने ||शक्य आहे माझे हे रूप पाहणे | जे पाहिलेस तू || अ.११, ओ.५३||

परंतपा, याप्रमाणे | शक्य आहे मला पाहणे ||जाणणे आणि तत्त्वतः माझ्यात प्रवेश करणे | केवळ अनन्य भक्तीने || अ. ११, ओ. ५४||

मला परमश्रेष्ठ मानणारा माझा भक्त | जो कर्मे माझ्यासाठी करतो, आहे सर्वसंगपरित्यक्त ||वैरहीन आहे सर्व भूतांप्रत | तो मलाच मिळतो पांडवा || अ.११, ओ.५५||

असा हा श्रीमद्भगवद्गीता या उपनिषदातील ब्रह्मविद्यांतर्गत योगशास्त्रामधील श्रीकृष्ण आणि अर्जुन यांच्या संवादातील ‘विश्वरूपदर्शनयोग ’ नावाचा अकरावा अध्याय पूर्ण झाला

                  || श्रीकृष्णार्पणमस्तु ||

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©Dr Hemant Junnarkar

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