Tuesday, June 25, 2024

नलकुबेर और मणिग्रीव की कहानी


नलकुबेर और मणिग्रीव की कहानी


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यह कहानी भगवान श्रीकृष्ण के बचपन की है | भगवान श्रीकृष्ण का अवतार सिर्फ दुष्टों को दंड देने के लिये नहीं, परंतु पतितों की मुक्ति के लिये भी था | बचपन में उन्हों ने की हुई मामुली हरकतों के पीछे कोई गहन अर्थ दिखाई देता हैं | यह कहानी इस बात को साबीत करती हैं | कहानी संक्षेप में कुछ इस तरह हैं |




भगवान श्रीकृष्ण बचपन में अपने पिता नंद बाबा और यशोदा  मैया के साथ रहते थे | एक दिन सुबह−सुबह माता यशोदा दही मथ रही थीं और नंद बाबा गौशाला में बैठकर गायों का दूध दुहवा रहे थे | तभी भगवान श्रीकृष्ण जाग गए और माता यशोदा से दुग्ध पान की जिद करने लगे। किंतु काम में व्यस्त होने के कारण यशोदा को थोड़ी देर  हो गई। भगवान श्रीकृष्ण  रूठ गए और गुस्से में यशोदा मैया के हाथ की मथनी  तोड़ डाली। यशोदा मैया को भी क्रोध आ गया। उन्होंने एक रस्सी से भगवान श्रीकृष्ण को  बांध दिया और रस्सी  आंगन में रखे हुए एक ऊखल को बांध दी।

यह कहानी कुछ इसी तरह से भी कही जाती हैं | भगवान श्रीकृष्ण बचपन में बहुत शरारतें करते थे | गोपिया न सोच सकी कि इस का कैसे हल किया जाये | उन की शरारतों से तंग आकर सब गोपिया मिलकर यशोदा  मैया के पास आई और भगवान श्रीकृष्ण की काफ़ी शिकायतें करने लगी | 

एक गोपी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और उन के साथी उस गोपी के घर में घुस गये और दस घड़ों में भरा हुआ दही और घी खा गये | दूसरे गोपी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और  साथियों ने उस गोपी के घर आकर घड़ों और छीकों में रखा हुआ मक्खन खाकर घड़े फोड़ दिये और छीके तोड़ डाले | तीसरे गोपी ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने उस गोपी के घर के गौ और बछडे़ जंगल में हांक दिये | इस तरह की कई और शिकायतें करके गोपियों ने कहा कि ऐसा ही होते रहा, तो उन्हे वह जगह छोड़कर और कही रहने के सिवा दूसरा कोई चारा नहीं रहेगा |

गोपियों की बातें सुन कर यशोदा ने हर किसी को समझाया | उन का जो कुछ नुकसान हुआ था, वह पूरा करने का आश्वासन उन्हे दिया और उन्हें यह भी कहा कि वह लडके को अभी ऐसे काबू करेगी कि फिर कभी वह ऐसा काम नहीं कर पायेगा | 

इस तरह से गोपियों को आश्वस्त करके भेजकर यशोदा मैया ने कृष्ण को बुलाया और उसे बहुत डॉंटकर उस की बॉंह पकडकर गाडी के पास ले गई | बड़े ओखल से एक रस्सी बॉंधकर उस के कमर में उस ने बॉंध दी |   फिर एक बेत लेकर कहा, 'अगर तुम यहॉं से हिले तो देखना क्या करती हूॅं',  और   ऐसा कहकर वह अपने घर के कामों में लग गई  |


 कुछ समय बीता | कृष्ण ने रस्सी को पकड़कर ओखल अपनी ओर घसीट लिया |

पशुओं के छप्पर के पास दो पेड़ थे | कृष्ण ओखल पहियेवाले खिलौने की तरह घसीटता घसीटता उन दोनों पेड़ के बीच में ले गया | फिर उस ने ओखल यूॅं ज़ोर से खींचा कि दोनों पेड़ फड़फड़ाते नीचे गिर गये |




वृक्षों के गिरने से  भारी शोर हुआ | कई गोप  गोपिया भागी भागी आई | क्या हुआ था उन्होंने  भी देखा | कुछ गोपिकाओं ने यशोदा के पास जाकर कहा,

'तेरा लड़का भी क्या राक्षस हैं | उसे भी कहीं ओखल से बॉंधा जाता हैं? वह बड़े बड़े पेड़ उखाड़कर अपने ऊपर डाल रहा हैं | सोच रही हो तुम ने बड़ा अक्लमंदी का काम किया हैं | जाकर देखो कही लड़के पर आफ़त न आ पड़े | '

यह सुनते ही यशोदा का दिल धड़का | वह कॉंप उठी | वह तेज़ी से भागने लगी , न उसे चोटी की फ़िक्र थी , न ऑंचल की ही, उबड़ ताबड़ भागी |

नंद बाबा और सब    पड़ोसी  भी वहाँ दौड़ते हुए पहुँचे। तब सभी ने एक चमत्कार देखा। उन वृक्षों में से दो सुंदर दिव्य युवक, भगवान  श्रीकृष्ण के सामने  खड़े थे। उन्हों ने  भगवान श्रीकृष्ण के सामने लीन होकर उन्हे प्रणाम किया | अपनी  मुक्ति के लिये उन्हों ने भगवान श्रीकृष्ण को धन्यवाद दिया |  फिर वे अंतर्धान होकर अपने लोक को चले गए।




अब वह दिव्य युवकों की कहानी समझ लेते हैं | देवों का कोष सम्हालने वाले  देव कुबेर के दो पुत्र थे,  एक का नाम नलकूबर था और दूसरे का मणिग्रीव। कुबेर के ये दोनों बेटे अपने पिता की धन−सम्पत्ति के प्रमाद में घमंडी और उद्दंड हो गए थे। राह चलते लोगों को छेड़ना, उन पर व्यंग्य कसना, ग़रीब लोगों का मखौल उड़ाना उन दोनों की प्रवृत्ति बन गयी थी। 

एक दिन दोनों भाई नदी में स्नान कर रहे थे। तभी आकाश मार्ग से आते हुए उन्हें देवर्षि नारद दिखाई दिए। उनके मुख से ‘नारायण−नारायण’ का स्वर सुनकर नदी पर स्नान के लिए पहुँचे लोग उन्हें प्रणाम करने लगे, लेकिन नलकूबर और मणिग्रीव तो अपने पिता के धन के कारण दंभ में भरे हुए थे। उन्होंने नारद को प्रणाम करने के स्थान पर उनकी ओर मुँह बिचकाया और उनका उपहास उड़ाया।

उन दोनों का व्यवहार नारद को बहुत अखरा। क्रोध में भरकर उन दोनों को शाप दे दिया कि वह दोनों मर्त्यलोक में  वृक्ष बनकर रहेंगे |  शापवश वह दोनों मर्त्यलोक में, गोकुल में नंद बाबा के द्वार पर पेड़ बन कर खड़े हो गए। भगवान कुबेर को अपने पुत्रों की दुर्दशा की ख़बर मिली तो वह बहुत दुःखी हुआ और महर्षि नारद से बार−बार क्षमा याचना करने लगे। नारद जी को उन पर दया आ गई। उन्होंने अपने शाप का परिमार्जन करते हुए कहा, ‘  द्वापर  युग में भगवान विष्णु भगवान श्रीकृष्ण के रूप में वहाँ अवतरित होंगे और दोनों वृक्षों का स्पर्श करेंगे तब उन्हें मुक्ति मिल जाएगी।’

इस तरह से भगवान श्रीकृष्ण की अद्भुत लीला से नलकूबर और मणिग्रीव को मुक्ति मिल गई |

इस कहानी से हमें कई  सीखें  मिलती हैं | एक सीख ऐसी है  कि जो लोग वासनाविवश होकार अपने इंद्रियों पर काबू नहीं कर पाते हैं, उन्हें नलकूबर और मणिग्रीव जैसे वृक्षरूप बन गये उसी तरह वृक्ष की गति मिलती हैं | ऐसी स्थिति में वह हलचल भी नहीं कर पाते | 

दूसरी सीख यह हैं कि अपनी वासनाओं पर काबू पाने के लिये हमें भगवान श्रीकृष्ण की शरण में जाना चाहिए और उन की भक्ति में लीन रहना चाहिये |

Tuesday, June 18, 2024

मृत्युंजय महामंत्र - एक अर्थबोध

©Dr Hemant Junnarkar, All rights reserved

मृत्युंजय महामंत्र:

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्धनात्
मृत्योर्मुक्षीय माSमृतात्


बहुतेक संकेतस्थळांवर असणारा अर्थ:

तीन नेत्र असणाऱ्या त्र्यंबकाचे, शिवाचे , जो सुगंध देणारा, पोषण करणारा आहे, आम्ही यजन करतो. काकडी ज्याप्रमाणे आपल्या बंधनापासून (=वेलाशी असणाऱ्या संलग्नतेपासून) मुक्त होते त्या प्रमाणे आम्हाला अमरत्वापासून नाही तर मृत्यूपासून मोक्ष किंवा मुक्ती मिळू दे.

वरील अर्थ ओढून ताणून काढलेला आणि संस्कृत व्याकरणाचे नियम न पाळणारा आहे. या अर्थातील चुका थोडक्यात खाली दिल्या आहेत-

शिवास सुगंध देणारा किंवा पुष्टी देणारा म्हणण्यात चूक नाही. पण पुढे जो 'उर्वारुकासारखा' म्हटले आहे, ते कुणाला असा प्रश्न राहतो. मग उर्वारुक (काकडी ) जसा बंधनातून मुक्त होतो, असा अर्थ काढावा लागतो. या अर्थामध्ये मग बरेच पदरचे शब्द टाकावे लागतात. शिवाय मृत्यूपासून मुक्त कर, अमरत्वापासून नाही, यातील सर्वांत मोठी चूक म्हणजे मा या शब्दाचा अर्थ नको असा केला आहे. मा चा नकारार्थी उपयोग फक्त आज्ञार्थामध्ये केला जातो.

संस्कृतमध्ये प्रत्यय शब्दाला जोडले जातात, त्यामुळे शब्दांचा क्रम बदलला तरी अर्थामध्ये फरक पडत नाही. वृत्ताची बंधने पार पाडण्यासाठी शब्दांचा क्रम बदलला जातो. अशा वेळी अर्थबोधासाठी खालील पद्धत उचित ठरेल.

१. प्रथम अन्वय तयार करावा. म्हणजे गद्यामध्ये शब्द ज्या क्रमाने असतात, तसे म्हणजे कर्ता, कर्म आणि क्रियापद अशा क्रमाने मांडावे.

२. विशेषणे नामाजवळ तर क्रियाविशेषणे क्रियापदाजवळ आणावी. संस्कृतमध्ये नाम ज्या विभक्तीमध्ये असते, त्याच विभक्तीमध्ये विशेषण असते. त्यामुळे कुठल्या नामाचे कुठले विशेषण आहे ते ओळखणे सोपे जाते. 

३. संधींचा आणि समासांचा विग्रह करावा. आता तुम्हाला अर्थ स्पष्ट होऊ लागेल.

याप्रमाणे मी मृत्युंजय मंत्राचा खालीलप्रमाणे अर्थ केला आहे-

अन्वय/सन्धि/समासविग्रह: 
ॐ , उर्वारुकम् इव सुगन्धिं, पुष्टिवर्धनम् त्रि+अम्बकम् ( वयम्) यजामहे |
(स: त्र्यम्बक:) मा मृत्यो: अमृतात् बन्धनात् मुक्षीय |
शब्दार्थ:
उर्वारुक (ना. नपुं)= या शब्दाचा अर्थ स्पष्ट नाही. ही काहीतरी हिरवी , रसयुक्त वनस्पती असावी. बऱ्याच संकेतस्थळावर या शब्दाचा अर्थ काकडी असा दिला आहे.
सुगन्धि (वि)=सुगंधी.
पुष्टिवर्धन (वि)=पोषक, पुष्टिकारक 
त्र्यम्बक (ना.पुं)=तीन नेत्र असलेला, शिव
यजामहे = यज् धातु आ.प. वर्तमानकाळ प्र.पु.ब.व.=यजन करतो
मुक्षीय=मला मोक्ष मिळू दे, मला मुक्ती मिळू दे. मुच् धातूचे आशिर्वादार्थी प्रथम पुरुषी एकवचनी रूप.
मुच् धातू गण ७, उ.प.
आशिर्वादार्थी आत्मनेपदी रूपे
आशिर्लिङ्लकार
पुरुष एकवचन द्विवचन बहुवचन
प्रथम मुक्षीष्ट मुक्षीयास्ताम् मुक्षीरन्
मध्यम मुक्षीष्ठा: मुक्षीयास्ताम् मुक्षीध्वम्
उत्तम मुक्षीय मुक्षीवहि मुक्षीमहि

अर्थ: ॐ, उर्वारुकाप्रमाणे सुगंधी आणि पुष्टिकारक अशा त्र्यंबकाचे (=तीन नेत्र असणाऱ्या शिवाचे ) (आम्ही) यजन करतो. 
(तो त्र्यंबक) मला मृत्यूच्या अमृत (=मृत्यू न पावणाऱ्या, नष्ट न होणाऱ्या) बंधनापासून मला मोक्ष, मुक्ती देवो.

श्लोकाचे सौंदर्य:
त्र्यम्बक=शिवास अनेक नावे असूनसुद्धा येथे त्र्यम्बक, म्हणजे तीन नेत्र असलेला या नावाची निवड केली आहे. कारण मंत्राच्या पुढील चरणामध्ये मृत्यूच्या बंधनातून मुक्त करण्याची प्रार्थना केली आहे.

सर्व जीवांस दोन नेत्र आहेत. केवळ शिव हेच असे दैवत आहे, ज्यास तीन नेत्र आहेत. म्हणजे दोन नेत्र असणाऱ्यांना जे दिसते, त्यापेक्षा अधिक शिवाला दिसते. दोन नेत्र असणारा केवळ जन्म आणि मृत्यूपर्यंत असणारा प्रवासच जाणू शकतो. परंतु यापेक्षा अधिक तिसरा नेत्र असणारा शिव या दोन्ही ध्रुवांपलिकडे पाहण्याची क्षमता असला पाहिजे. जसे श्रीमद्भगवद्गीतेत भगवान श्रीकृष्ण म्हणतात,

Tuesday, June 4, 2024

कालिया मर्दन


कालिया मर्दन




भगवान श्रीकृष्ण और कालिया नाग की कथा श्रीमद्भागवतपुराण के दसवें स्कंध के सोलहवें अध्याय में कथन की है। यह कथा में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने बचपन में की हुई प्रमुख लीला का वर्णन है, जो 'कालिया मर्दन' नाम से प्रसिद्ध  हैं |  यह कहानी संक्षिप्त रूप में इस तरह हैं-

उस समय भगवान श्रीकृष्ण छोटे  थे और अपने बडे भाई बलराम के साथ पिता    नंद बाबा और माता यशोदा मैया के साथ वृंदावन में रहते थे |

वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण अपने भाई और गोपालकों के साथ पशुओं  को लेकर उन को चराते, गाते नाचते, बॉंसुरी बजाते अपना समय खुशी से बीताते थे |

वृंदावन के पास यमुना नदी का एक पोखर था | जब नदी का पानी किसी बडे गड्ढे में जम जाता है, तब उसे पोखर कहते हैं | यह पोखर इतना बडा़ था, कि उस में समुद्र की तरह पानी उफनता हुआ  दिखता था | 

एक दिन उस पोखर में  कालिया नाम का एक नाग अपने परिवार के साथ रहने को आया | कालिया एक विषैला और पांच फन वाला नाग था | उस के मुॅंह से ज्वालाए निकलती थी |   यमुना के पोखर में रहने से पहले वह   रमणक द्वीप में रहता था । लेकिन नागों के शत्रु गरुड़ के डर से उसे वहां से भागना पड़ा। गरुड़ को वृंदावन में रहने वाले योगी सौभरि ने श्राप दिया था कि  गरुड  वृंदावन आयेंगे तो गरुड की  मृत्यु हो जायेगी | यह जानकर कि यही एकमात्र स्थान है जहाँ गरुड़ नहीं आ सकते, कालिया ने वृंदावन में वास करने का निर्णय लिया।

एक दिन, भगवान श्रीकृष्ण और उनके बाल सखा यमुना नदी के किनारे  खेल रहे थे। उस समय भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान यमुना नदी के पोखर पर गया |  यमुना  का  पानी   कालिया के विष के प्रभाव से एकदम काला हो गया था। किनारे पे जो पेड़ और लताए थी, वह भी कालिया के विष के प्रभाव से  सूख गई थी | उस जगह पे कोई पशु या पक्षी जीवित नहीं रह सकता था |

भगवान श्रीकृष्ण ने सोचा कि उसे पोखर में उतर कर उस महासर्प के अभिमान को चूर करना होगा | उस से पोखर में पशुओं और लोगों के लिये पानी की सुविधा भी हो जाएगी |  उस से और भी एक लाभ होता | कालिया के परिवार में और भी असंख्य सॉंप थे , जो वृंदावन में जहॉं तहॉं घूमा करते थे और उस प्रदेश को अपने अस्तित्व से भयंकर बनाते थे | यदि कालिया को मार दिया गया तो वे स्थल भी सुरक्षित हो जायेंगे |

यमुना नदी के किनारे एक कदंब वृक्ष था, जो अकेला जीवित था | उस का कारण यह कहा जाता है, कि जब गरुड  अपनी  मॉं की मुक्ति के लिये अमृत ले जा रहा था, तब अमृत की कुछ बूंदे गरुड ने भविष्य में भगवान श्रीकृष्ण की सहायता के लिये जान बूझकर गिरायी थी | कोई और लोग ऐसा भी कहते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण के पदस्पर्श से कदंब वृक्ष जीवित हो गया |

भगवान श्रीकृष्णने उस कदंब वृक्षपर चढकर  पानी में कूदने का निश्चय किया | उस ने किसी से कुछ नहीं कहा | अपने बाल बाॅंध लिये |  धोती कसकर  बाॅंध ली  | आपनी बॉंसुरी कमर में बॉंध दी | चप्पल उतार दी |  अपने हाथ की रस्सी वगैरह दूर फेक दी | एक ही क्षण में भगवान श्रीकृष्ण    कालिया को सबक सिखाने के लिए नदी में कूद पड़े |

भगवान श्रीकृष्ण के यमुना में कूदते ही ऐसी उथल पुथल आ गई मानो क्षीर सागर में मंदर पर्वत  गिर पडा हो | वह उथल पुथल पाताल तक पहुॅंच गई |

यमुना के पानी में अचानक हुई यह उथल पुथल देखकर कालिया को बड़ा क्रोध आ गया | उस ने अपने काले और बड़े बड़े  पॉंच फण खोले और भगवान श्रीकृष्ण पर हमला बोल दिया | फिर कालिया ने अपने विशाल शरीर से कृष्ण को पकड़ लिया,उस ने अपना मुख इस तरह से खोला ताकि उस के बड़े बड़े दॉंत दीखे | वह विषयुक्त ज्वालाए उगल रहा था | मुड़नेवाले अपने शरीर को उस ने फैला दिया |भगवान श्रीकृष्ण को उस ने जगह जगह काटा | उस के शरीर को लपेटकर वह दबाने लगा |  यह देख  कालिया के बन्धु, स्त्री, बच्चे, आदि महासर्पोंने भगवान श्रीकृष्ण को घेर  लिया और लपटें उगलते उसे काटा | भगवान श्रीकृष्ण मूर्च्छित हो गये |

गोपकुमार, जो यह सब देखते थे, डर गये | वे  भागे भागे वृंदावन गये और यशोदा मैया को ऑंखों देखा हाल बताया | यह सुनकर यशोदा  मैया और नंद बाबा सब गॉंववालों के साथ यमुना की पोखर की ओर दौड पडे |

सब यमुना के किनारे, भगवान श्रीकृष्ण को देखकर पसीना पसीना हो गये | भगवान श्रीकृष्ण सॉंप के चुॅंगल में फॅंसकर बडे दयनीय स्थिती में थे | ऐसा लगता था, जैसे कोई कुछ भी न कर सकता हो | नंद बाबा और यशोदा मैया मूर्च्छित हो गये | बाकी लोगों ने उन पर पानी छिडक कर उन को होश में लाया |

सब दुःखी हो उठे | यह सोच कर कि यशोदा का पुत्र मर गया , हर किसी ने तरह तरह की बातें की,

'चलो हम सब पोखर में उतर कर उस सॉंप से युद्ध करे | आओ, कृष्ण को छुडाये | नहीं तो इस कालिया की विषाग्नी में हम भी मर जायेंगे | बिना कृष्ण के हम कैसे गॉंव जाये?'

बलराम सब देख रहा था और सब की बातें सुन रहा था | आखिर उस ने भगवान श्रीकृष्ण से यूॅं कहा, 'अरे कृष्ण, लोकहित की भावना भूलकर इस कम्बख्त साॅंप की चुॅंगल में आ फसे | देखा, हमारे सब लोग किस दयनीय स्थिति में हैं | इस ज़हरीले कीडे को मारकर हम सब को संतुष्ट करो |'

यह सुनते ही भगवान श्रीकृष्ण होश में आ गये और तुरन्त सांप की चुॅंगल से निकल आये |  उन्हों ने  कालिया की पूंछ पकड़ी और कूदकर उसके फन पर  जाकर खड़े रह गए। भगवान श्रीकृष्ण ने मानो पूरे ब्रह्मांड का भार अपने सर पर  लिया था | वह कालिया के सभी सिरों को अपने पैरों से जोर जोर पीटने लगे ताकि उसके अंदर का सारा विष बाहर निकल जाए। भगवान‌ श्रीकृष्ण अपने हाथ में बांसुरी लेकर कालिया के सिर पर नृत्य करने लगे। कालिया के सिर पर नृत्य करते हुए कृष्ण धीरे-धीरे यमुना के पानी की सतह पर आ गए।

वह कालिया की पूॅंछ हाथ में लेकर उस के सिर पर उछल कूद करने लगे | यमुना की लहरें मानो ताल दे रही हो | भगवान श्रीकृष्ण को  सुरक्षित देखकर सारे गोकुलवासी खुशी से झूम उठे , गाने लगे | भगवान कृष्ण को कालिया के फणों पर नृत्य करते , आकाश में से देवताओं ने देखा |

फनों पर श्रीकृष्ण के लगातार वार से कालिया के मुंह से रक्त प्रवाह शुरू हो गया और वह धीरे-धीरे मरने लगा। लेकिन तभी कालिया की पत्नियां प्रकट हुईं और हाथ जोड़कर श्री कृष्ण से प्रार्थना करने और अपने पति के जीवन के लिए दया मांगने लगीं।

कालिया के सिर चूर हो गये | उस की नाकों से खून की धारा बहने लगी | उस के दॉंत टूट गये | लपटों के साथ उस के मुॅंह से विष निकला | वह कुॅंचल जाने पर कमल डॅंडी हा हो गया | मरने को ही था | तब उस ने दीन स्वर में कहा,' देव, यह बिना जाने कि तुम सर्वेश्वर हो, मैं ने अपने तुच्छ कोप में तुम्हारे शरीर पर प्रहार किया | तुम ने मुझे उचित दण्ड दिया | मुझ पर दया करो | मुझे क्षमा करो | मेरा विष चला गया | मेरी बुद्धि ठिकाने पे आ गई हैं | मैं तुम्हारा दास बनकर रहूॅंगा | जो तुम कहोगे वह करूंगा | तुम्हारे चरण छूकर मैं पवित्र हो गया हूॅं | तुम्हारा कोप मेरे लिये तुम्हारा अनुग्रह हैं |

भगवान श्रीकृष्ण को कालिया पर दया आ गई और उन्हों ने कहा ,' इस के  आगे तुम यमुना नदी में नहीं रह सकते | तुम अपने लोगों को इकट्ठा करके समुद्र में चले जाओ | जब तुम्हारा विष चला जायेगा , तो नदी का पानी साफ हो जायेगा और लोगों के काम आयेगा | तुम्हारे सिर पर मेरे पैरों के चिह्न देखकर गरुड तुम्हारा कुछ नहीं बिगाडेगा | यही तुम्हे मेरा वर हैं | '

कालिया अपने परिवार को लेकर समुद्र की ओर निकल पड़ा | भगवान श्रीकृष्ण नदी में से किनारे पे आ गये | यशोदा  मैया ने उसे गले लगाया | भगवान श्रीकृष्ण ने नंद बाबा को नमस्कार किया | नंद बाबा ने उसे आशिर्वाद दिया | गोप कुमारों ने भगवान श्रीकृष्ण को घेर दिया और उस की प्रशंसा करने लगे | उस पर आश्चर्य करने लगे | उस के बाद भगवान श्रीकृष्ण की प्रशंसा करते हुए सब वृंदावन लौट पड़े |

भगवान श्रीकृष्ण ने 'कालिया मर्दन' की इस कहानी को ऐसा वर दिया है कि जो कोई इस कहानी का पाठ या श्रवण करेगा उसे सॉंपों से भय नहीं रहेगा |