Wednesday, October 30, 2024

श्रीमद्भगवदगीता अध्याय १- अर्जुनविषादयोग

श्रीमद्भगवदगीता 

अध्याय १- अर्जुनविषादयोग

(c) Dr Hemant Junnarkar, All rights resertved

 धृतराष्ट्र म्हणाला

कुरुक्षेत्र म्हणजे धर्मक्षेत्र I तेथे युद्धासाठी जमलेले एकत्र II 

पांडव आणि माझे पुत्र I करतात काय, सांग संजया II अ.१ ओ.१ II

दुर्योधनाकडून कौरव आणि पांडवांच्या सैन्यांचे वर्णन:

 संजय म्हणाला

पांडवांचे विशाल सैन्य पाहून I राजा दुर्योधन II

आचार्यांजवळ (=द्रोणाचार्यांजवळ) जाऊन I असे म्हणाला, II अ.१ ओ.२ II

‘पांडुपुत्रांचे हे मोठे सैन्य I बघून घ्या आचार्य II  

द्रुपदपुत्र, तुमचा बुद्धिमान शिष्य, I त्याने रचलेले   II अ.१ ओ.३ II 

युद्धात येथे महाधनुर्धर I भीम आणि अर्जुन शूर II 

तसेच महारथी थोर I युयुधान, विराट, द्रुपद II अ.१ ओ. ४II

धृष्टकेतु आणि चेकितान I काशिराज वीर्यवान II

पुरुजित्, कुंतिभोज वीर महान I तसाच शैब्य नरश्रेष्ठ II अ.१ ओ. ५II

युधामन्यू आणि विक्रांत | उत्तमौजा वीर्यवंत ||  

सौभद्र आणि द्रौपदीचे सुत | सारेच महारथी ||अ.१ ओ.६ ||

आता जे विशेष आमचे | नायक माझ्या सैन्याचे || 

ज्ञान करून देतो त्यांचे | तुम्हास हे द्विजोत्तम || अ. १ ओ.७ ||

भीष्म आणि स्वत: आपण | नेहमी जिंकणारे कृप आणि कर्ण || 

अश्वत्थामा, विकर्ण | तसाच सौमदत्ती || अ. १, ओ. ८ ||

आणखी आहेत पुष्कळ शूर | माझ्यासाठी जिवावर उदार || 

जाणती विविध शस्त्रांचा वापर | सारे निपुण युद्धात || अ. १, ओ. ९ ||

असे अमर्याद सैन्य आमचे | भीष्म करती रक्षण ज्याचे || 

मर्यादित परी हे सैन्य त्यांचे | रक्षिलेले भीमाने || अ.१, ओ.१०||

सर्व व्यूहद्वारस्थानी | नेमून दिलेल्या ठिकाणी राहूनी || 

करावे आपण सर्वांनी | भीष्मांचेच रक्षण’ || अ.१, ओ. ११||

दोन्ही सैन्यातील प्रमुख योद्धयांकडून शंखनाद

मग कुरुवृद्ध प्रतापवान पितामहांनी | सिंहगर्जना करूनी || 

शंख फुंकूनी | आनंदित केले दुर्योधना || अ.१, ओ.१२ ||

तेव्हा शंख आणि भेरी | पणव, आनक, गोमुख अशी वाद्ये सारी || 

नाद करती भारी | एकदम वाजू लागता || अ.१ ओ.१३ ||

तेव्हा युक्त शुभ्र घोड्यांनी | रथात मोठ्या बैसुनी || 

करीती दिव्य शंखांचा ध्वनी | माधव आणि पांडव  || अ.१, ओ.१४||

पांचजन्य हृषीकेशाने | देवदत्त धनंजयाने || 

पौंड्र भीमकर्मा वृकोदराने | शंख असे वाजविले || अ. १, ओ. १५II

अनंतविजय कुंतीपुत्र राजा युधिष्ठिराने | सुघोष नकुलाने || 

मणिपुष्पक सहदेवाने | शंख असे वाजविले || अ. १, ओ.१६II

काशिराज धनुर्धर-शिरोमणी | शिखंडी महारथी अग्रणी ||  

ध्रुष्टद्युम्न आणि विराट नृमणी | अपराजित सात्यकी || अ.१, ओ. १७||

द्रुपदराजा आणि पुत्र द्रौपदीचे | सौभद्र, बाहू मोठे ज्याचे || 

सर्वांनी विविध शंखांचे | नाद केले महाराज || अ.१, ओ. १८||

तो घोष पडता कानी | धार्तराष्ट्रांची हृदये गेली विदीर्ण होऊनी || 

त्या नादाने गेले दुमदुमुनी| पृथ्वी आणि आकाश ||अ. १, ओ. १९||

धार्तराष्ट्रांस सिद्ध पाहून | रथावरी ज्याच्या शोभे हनुमान || 

तो पांडव धनुष्य उचलून | शस्त्रप्रहार करण्याआधी || अ. १, ओ.२०||

वाक्य असे हृषीकेशाला | हे राजा बोलला || 

 अर्जुन म्हणाला

'हे अच्युता, आण रथ आपला || दोन्ही सैन्यांच्या मध्यभागी || अ.१, ओ.२१II

मला आहे निरीक्षण करायचे | युद्धासाठी इच्छुकांचे || 

कुणाविरुद्ध मला लढायचे | या रणसंग्रामात || अ.१ ओ. २२||

मला आहे अवलोकन करायचे | युद्धास एकत्र आलेल्यांचे || 

धार्तराष्ट्राच्या दुर्बुद्धीचे I प्रिय इच्छिणाऱ्यांचे || अ. १, ओ. २३ ||

 असे सांगता त्या क्षणास | गुडाकेशाने हृषीकेशास || 

हृषीकेशाने आणून त्या उत्तम रथास || हे भारता, दोन्ही सैन्यांमध्ये- || अ. १ ओ २४ ||

-सर्व राजांच्या, | समोर भीष्मद्रोणांच्या ||  

श्रीभगवान म्हणाले

'समोर जमलेल्या या |कुरूंना पहा पार्था’ || अ. १, ओ. २५ ||

अर्जुनाकडून सैन्याचे निरीक्षण आणि अर्जुनाचा विषाद:

तेथे पार्थाने पाहिले | काका आणि आजोबा आपले || 

आचार्य, मामा, भाऊ उभे ठाकले | मुलां-नातवंडां-मित्रांसह || अ. १ ओ. २६ ||

सुहृद आणि श्वशुर | दोन्ही सैन्यांत समोर || 

बंधू सारे युद्धास तयार | पाहून तो कौंतेय || अ. १, ओ. २७II

 होऊन फार करुणा-ग्रस्त | बोलला होऊन दु:खित || 

अर्जुन म्हणाला, 

‘पाहून हे उपस्थित | युद्धासाठी स्वजन || अ.१, ओ. २८||

अवयव जातात गळून | तोंडास कोरड पडून || 

कापरे भरून | काटा येतो अंगावर || अ. १, ओ. २९||

गांडीव धनुष्य हातातून गळते | त्वचा सारी जळते || 

उभे न मला राहवते | भटकते माझे मन ||अ. १, ओ. ३० ||

लक्षणे सारी निश्चित | केशवा, विपरीत दिसतात || 

न दिसे काही हित | स्वजनांस युद्धात मारूनीया || अ.१, श्लो. ३१||

नको मला विजय | 

नकोत सुखे, नको राज्य || 

गोविंदा, कामाचे ते काय | 

राज्य किंवा जीवन || अ.१, ओ.३२||

ज्यांच्यासाठी इच्छा करायची | राज्य, भोग आणि सुखांची || 

त्यांची तयारी युद्धाची | प्राण आणि धन सोडून || अ.१, ओ.३३||

आचार्य, पुत्र, पितर | पितामह बरोबर || 

मामा, नातवंडे, श्वशुर | मेहुणे आणि इतर नातलग || अ. १, ओ. ३४ ||

मी न इच्छितो यांस मारण्याला | मधुसूदना, जरी गेलो मारला || 

किंवा दिले जरी त्रैलोक्याचे राज्य मला | काय कथा पृथ्वीची || अ.१, ओ. ३५ ||

मारून धार्तराष्ट्रांस | जनार्दना, सुख काय आम्हास || 

पापच येईल आश्रयास | या आततायांस मारिता || अ.१, ओ.३६ ||

न योग्य मारणे आम्ही त्यांना | स्वबांधवांना - धार्तराष्ट्रांना || 

कसे मारून स्वजनांना | व्हावे सुखी माधवा || अ. १, ओ. ३७ ||

लोभामुळे झाला यांचा | नाश बुद्धीचा || 

दिसे न दोष कुळक्षयाचा | आणि पाप मित्रद्रोहाचे || अ.१, ओ.३८||

मला न येई उमगून | कसे निवृत्त व्हावे या पापातून || 

स्पष्ट दिसत असून | कुलक्षयाचा दोष जनार्दना || अ.१, ओ. ३९||

नाश होता कुळाचा | -हास होतो सनातन कुळधर्माचा || 

बसे पगडा अधर्माचा | कुळावरी साऱ्या || अ.१, ओ. ४०||

कृष्णा, अधर्म माजता | कुलस्त्रिया जाती अध:पाता || 

वार्ष्णेया, स्त्रिया दूषित होता | वर्णसंकर होतसे ||अ.१, ओ.४१||

कुलनाशकांच्या कुळात संकर घडतो | तो नरकास कारण होतो ||

पितरांचेही पतन घडवतो I पिंडोदकक्रियांचा लोप होता ||अ.१, ओ.४२||

वर्णसंकरकारक या | दोषांनी कुलनाशकांच्या  || 

जाती लया | शाश्वत जातिधर्म, कुलधर्म || अ.१, ओ. ४३||

कुलधर्म लयास गेलेल्या | जनार्दना, अशा मनुष्यां || 

नरकात लागे राहावया | असे आम्ही ऐकतो || अ.१, ओ. ४४ ||

अरेरे, केवढ्या पापास | तयार झालो करावयास || 

मिळवण्या राज्यसुखास | उठलो स्वजन मारण्या || अ.१, ओ.४५||

मी न करताही प्रतीकार | हाती न धरताही हत्यार  || 

धार्तराष्ट्र करतील माझा संहार | परवडेल ते मला’ ||अ.१, ओ. ४६||

अर्जुन असे रणात बोलून | गेला रथात बसून || 

धनुष्यबाण टाकून | शोकाकुल मनाने ||अ.१, ओ.४७||


Saturday, October 26, 2024

ऑटिस्टिक बच्चे को स्कूल में कैसे कामयाब करे

ऑटिस्टिक बच्चे को स्कूल में कैसे कामयाब करे 

अगर आपका बेटा या बेटी ऑटिस्टिक हो तो आपको काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।  इनमें से एक समस्या पर इस पुस्तक में विचार किया गया है।  वह समस्या एक ऑटिस्टिक बच्चे के प्राथमिक विद्यालय से माध्यमिक विद्यालय मे प्रवेश और वहॉं उस की  सफलता है।  आओ  जानते हैं पुस्तक क्या कहता हैं |

१. आदर्श स्कूल की उम्मीद मत करो :

अध्याय 1 में लेखक शुरुआत में ही समझाता है कि आपको कहीं भी एक आदर्श स्कूल नहीं मिलेगा।  स्कूल में शामिल होने से पहले, आपको स्कूल की वेबसाइट का अध्ययन करके, अन्य माता-पिताओंसे पूछताछ करके अपना होमवर्क करना चाहिए।  स्कूल का दौरा करना बेहतर है.  लेखक यहां एक टिप देता है.  जिस स्कूल में हर जगह  अगर 'यह करना मना है, वह करना निषिद्ध है' ऐसे लिखे हुए बोर्ड दिखते होंगे, तो  , वह संभवतः आपके बच्चे के लिए अच्छी  स्कूल नहीं है।   आप स्कूल के लिए अपनी अपेक्षाओं का एक चार्ट बना सकते हैं और जैसे-जैसे आपका होमवर्क आगे बढ़ता है, उसे भरते जा सकते हैं।  यह सब करते समय आपको समय-समय पर अपने बच्चे को  अवगत करते रहना चाहिए।

२. स्कूल में प्रवेश से पहले तैयारी करो:

चलो, तुम्हारा स्कूल तय हो गया।  स्कूल में प्रवेश से पहले की जाने वाली तैयारियों का उल्लेख अध्याय २ में  किया गया है।  तैयारी चिंता को कम करने की कुंजी है।   लेखक 'टिप्स चार्ट' नामक एक चार्ट बनाने का सुझाव देते हैं।  इस चार्ट में बच्चे को किन समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है और उन समस्याओं का  कैसे समाधान किया जा सकता है, यह दर्ज करते  जाना चाहिए।

अगर आपके बच्चे को कुछ समस्याएं हैं तो उन्हें स्कूल के सामने न पढ़ें, बल्कि बच्चे के अच्छे गुणों के बारे में बात करके बच्चे की सकारात्मक छवि बनाएं।  कल्पना कीजिए, आप स्कूल के सामने अपने बच्चे की मार्केटिंग कर रहे हैं।

३. ज़मीनी तैयारी कैसे करें:

अध्याय 3 'जमीनी तैयारी' के बारे में है।   आपको अपने बच्चे को शारीरिक तैयारी के साथ-साथ मानसिक रूप से भी तैयार करना चाहिए।  लेखक बच्चे को 'विज़ुअल थर्मामीटर' नामक उपकरण का उपयोग करना सिखाने का सुझाव देते हैं।  यह डिवाइस ट्रैफिक लाइट की तरह हरे, पीले और लाल रंग का उपयोग करता है।  आप इन रंगों का इस्तेमाल करके अपने बच्चे को अपनी भावनाएं व्यक्त करना सिखा सकते हैं।

४. स्कूल के साथ सहयोग करो:

आप उस स्कूल के साथ सहयोग कर रहे हैं जहाँ आपका बेटा जाता है।  अध्याय 4 ऐसे सहयोग की नींव रखने के बारे में है।   इस तरह के सहयोग के लिए स्कूल और आपके बीच सूचनाओं का नियमित आदान-प्रदान होना चाहिए।  इससे दोनों पक्षों के बीच विश्वास का माहौल बनेगा और भविष्य में टकराव से बचा जा सकेगा।  इसके लिए आपकी प्रतिक्रियाएँ सकारात्मक होनी चाहिए न कि नकारात्मक।  आपके और स्कूल के बीच एक अच्छी साझेदारी से आपके बच्चे को लाभ होगा।

५. बच्चे के भावनाओं का विस्फोट न होने दे:

जब  बच्चे की भावनाएं भड़क उठें और वह रोने लगे या फिर गुस्से में आकर चिल्लाने लगे, तो किसी माता-पिता के लिये यह बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल हैं | लेखकों का कहना है कि इस तरह का प्रकोप अचानक नहीं होता है, बल्कि कई छोटी प्रतिकूल घटनाओं का संचयी प्रभाव हो सकता है।  यदि आप किसी ऐसी घटना से अवगत हैं जो बच्चे के भावनात्मक आक्रोश को भड़काती है, तो स्कूल को पहले से बताएं।   बच्चे को कुछ ऐसा दें जो दूसरों को महत्वहीन लग सकता है लेकिन बच्चे के लिए महत्वपूर्ण है, जैसे खिलौना, चाबी की चेन, या कुछ और चीज़ जो बच्चे की भावनाओं के विस्फोट को शांत कर सके।  कभी-कभी यह स्कूल के नियमों में फिट नहीं बैठता।  फिर आपको स्कूल को मनाना होगा.

६,७. कठिन परिस्थितियों का सामना कैसे करें:

यदि किसी नई परिस्थिति का सामना करना पड़े तो हम अपने अनुभव के बल पर उस परिस्थिति से निकलने का रास्ता बना सकते हैं।  लेकिन ऑटिस्टिक बच्चे में इस तरह के अनुभव की कमी होती हैं और यह उस के लिये  एक बड़ी बाधा है। लेखक अध्याय 6 और 7 में ऐसी बाधाओं पर विचार करते हैं।  लेखक का कहना है कि माता-पिता को अपने बच्चे की सभी समस्याओं को स्वयं हल करने के बजाय उन्हें बाधाओं का सामना करने के लिए विकसित करना चाहिए।

८. सॅच्युरेशन मॉडेल:

अध्याय 8 सॅचुरेशन मॉडल पर चर्चा करता है।    मेडिकल मॉडल मानता है कि विकलांग लोग अपनी दुर्बलताओं या मतभेदों के कारण विकलांग होते हैं जबकि सॅचुरेशन मॉडल मानता है कि विकलांग लोग कुछ समाज की धारणाओं के कारण विकलांग होते हैं।  सॅचुरेशन मॉडल ऑटिस्टिक व्यक्तियों को समाज में समान रूप से कार्य करने का अवसथ प्रदान करता है।

९. बदमाश बच्चों से कैसे निपटे:

कुछ बच्चे ऐसे होते हैं जो स्कूल में बदमाशी करते हैं।  अध्याय 9 में बताया गया है कि यदि आपके बच्चे को इन प्रवृत्तियों वाले बच्चों द्वारा परेशान किया जा रहा है तो क्या करना चाहिए।  अगर कोई आपके बच्चे को धमका रहा है तो बच्चे के संपर्क में रहें और समय पर स्कूल को सूचित करें।

१०. दोस्तों की ज़रूरत:

स्कूल में बच्चों को दोस्तों की ज़रूरत होती है।   अध्याय 10 में, लेखक सुझाव देता है कि स्कूलों को बच्चों के बीच मित्रता विकसित करने के लिए क्लब स्थापित करने चाहिए और विभिन्न गतिविधियाँ आयोजित करनी चाहिए।

११, १२. स्कूल से असहमति:

अध्याय  11 और 12 में बताया गया है कि यदि आपकी स्कूल से असहमति है तो क्या करें।  ऐसी स्थितियों में लेखक संघर्ष की बजाय समन्वय पर जोर देते हैं।  आपको स्कूल को विनम्रतापूर्वक लेकिन दृढ़ता से अपनी भूमिका समझानी चाहिए।

१३. स्कूल को अलविदा:

इन सबके बावजूद  अगर स्कूल से आपकी नहीं बनती और स्कूल बदलने का समय आ जाता है तो आपको इसकी तैयारी भी कर लेनी चाहिए और स्कूल को अलविदा कहते समय कड़वाहट से बचना चाहिए और रिश्ते को दोबारा स्थापित करने की संभावना रखनी चाहिए यह अध्याय १३ मे बताया गया हैं |

१४. ऑटिस्टिक बच्चों के लिये आदर्श स्कूल:

अंतिम चौदहवें अध्याय में लेखक ऑटिस्टिक बच्चों के लिए एक आदर्श स्कूल के अपने विचार की व्याख्या करते  है। लेखकों के अनुसार ऐसे विद्यालय में ' टॉप डाऊन कल्चर' होना चाहिए। मतलब, वरिष्ठ स्तर पर अनुभवी लोगों का एक प्रबंधन मंडल होना चाहिए और उनके द्वारा लिए गए निर्णयों को निचले स्तर तक लागू किया जाना चाहिए। 

समीक्षा 🔬:

इस समीक्षा में जहां भी किसी लड़के का जिक्र हो तो समझ लेना चाहिए कि एक लड़की का भी जिक्र है.

यह पुस्तक यूके में स्कूल की स्थिति को ध्यान में रखकर लिखी गई है।   लेकिन पुस्तक में दिया गया मार्गदर्शन सभी स्कूली स्थितियों में लागू होता है।  दरअसल पुस्तक का विषय प्राथमिक विद्यालय से माध्यमिक विद्यालय में संक्रमण के बारे में है।  परन्तु लेखकों ने ऐसा कोई अन्तर कहीं नहीं बताया है।   सारी चर्चा स्कूल प्रवेश के बारे में है।  यहां किसी तैयार समाधान की उम्मीद नहीं की जा सकती।   इस पुस्तक को एक ऑटिस्टिक बच्चे के स्कूली जीवन और पालन-पोषण के लिए एक सामान्य मार्गदर्शिका कहा जा सकता है। मेरा इस पुस्तक का रेटिंग 'थ्री स्टार' हैं

पुस्तक परिचय:

पुस्तक का नाम : Championing your autistic teen at secondary school-getting the best from mainstream settings

लेखक : Debby Elly with Garreth D. Morewood.

पुस्तक की रूपरेखा:

यह पुस्तक चौदह अध्यायों में विभाजित है।   इन चौदह अध्यायों में, लेखक विभिन्न विषयों पर चर्चा करते हैं और पाठक को इस बारे में उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं कि कैसे एक ऑटिस्टिक बच्चा प्राथमिक विद्यालय से माध्यमिक विद्यालय में संक्रमित होकर सफलता प्राप्त कर सकता है। 

लेखक-परिचय:

इस पुस्तक के लेखक, गैरेथ डी मोरवुड, स्टूडियो थ्री के शैक्षिक सलाहकार हैं।   उन्होंने पहले 25 वर्षों तक यूके के स्कूलों में काम किया है।

पुस्तक की सह-लेखिका, डेबी एली, जुड़वां ऑटिस्टिक लड़कों की माँ हैं।  इसलिए उनके लेखन में आत्म-अनुभव का पहलू है।  वह क्षेत्रीय समाचार पत्रों में उप-संपादक रही हैं, फिर उन्होंने औ-किड्स पत्रिका की सह-स्थापना की, जो 2008 से 2021 तक चली।   वह एक फ्रीलांस ट्रेनर, लेखिका और सलाहकार के रूप में काम करती हैं।   उन्होंने ऑटिज़्म पर कई लेख और किताबें लिखी हैं

डिस्क्लेमर: 

गैरेथ डी. मोरवुड और डेबी एली लिखित पुस्तक 'चैंपियनिंग योर ऑटिस्टिक टीन एट सेकेंडरी स्कूल-गेटिंग द बेस्ट फ्रॉम मेन्स्ट्रीम सेटिंग्स' की यह एक संक्षिप्त समीक्षा है।

यह सिर्फ एक समीक्षा है.   समीक्षक पुस्तक पर किसी भी प्रकार के कॉपीराइट का दावा नहीं करता है।   कॉपीराइट लेखक/प्रकाशक के पास  है।  इस समीक्षा मे पुस्तक के संदर्भ और इसकी सामग्री की चर्चा केवल शिक्षा और मनोरंजन के लिए है।

-Dr Hemant Junnarkar

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Thursday, October 24, 2024

ऑटिस्टिक मुलाला शाळेत यशस्वी कसे कराल

ऑटिस्टिक मुलाला शाळेत यशस्वी कसे कराल:
तुमचा मुलगा किंवा मुलगी जर ऑटिस्टिक असेल तर तुम्हाला खूप समस्यांना तोंड द्यावे लागते. त्यांतील एका समस्येचा विचार या पुस्तकात केला आहे. ती समस्या म्हणजे ऑटिस्टिक मुलाने प्राथमिक शाळेतून माध्यमिक शाळेत प्रवेश घेऊन यशस्वी होणे. 

१. तुम्हाला परिपूर्ण शाळा कुठेच मिळणार नाही:
प्रकरण १ मध्ये  सुरुवातीलाच लेखक स्पष्ट करतात की तुम्हाला  परिपूर्ण शाळा कुठेही मिळणार नाही. शाळेत प्रवेश घेण्यापूर्वी  तुम्ही शाळेच्या वेबसाइटचा अभ्यास करून, इतर पालकांचा सल्ला घेऊन आपला होमवर्क  करावा. शाळेला भेट देणे चांगले.  लेखक इथे एक टिप देतात. ज्या शाळेत जागोजागी हे करू नका , ते करू नका, अशा पाट्या लावलेल्या आढळतील, ती शाळा तुमच्या मुलासाठी फार चांगली नसण्याची शक्यता आहे.  तुम्ही शाळेविषयी  आपल्या अपेक्षांचा  तक्ता तयार करू शकता आणि तुमचा होमवर्क जसजसा पुढे जाईल तसतसा तो भरू शकता. हे सर्व करीत असताना तुम्ही  आपल्या मुलाला वेळोवेळी विश्वासात घेणं चांगलं.

२. शाळाप्रवेशाची पूर्वतयारी:

चला, तुमची शाळा तर ठरली. प्रकरण २ मध्ये, प्रवेशाआधी काय पूर्वतयारी करावी, ते सांगितले आहे. पूर्वतयारी ही चिंता कमी करण्याची गुरुकिल्ली आहे.  लेखक 'टिप्स चार्ट' नावाचा तक्ता तयार करण्यास सुचवतात. या तक्त्यामध्ये  मुलाला कुठल्या अडचणी येऊ शकतात आणि त्यावर काय उपाय करता येतील, त्यांची नोंद करावी.

आपल्या मुलाला अमुक अमुक समस्या आहेत, त्यांचा पाढा शाळेपुढे वाचून दाखवू नका, तर मुलाच्या चांगल्या गुणांविषयी सांगून मुलाची एक सकारात्मक प्रतिमा तयार करा. कल्पना करा, की तुम्ही शाळेपुढे तुमच्या मुलाचे मार्केटिंग करीत आहात.

३. जमिनीची मशागत करा:

प्रकरण ३ 'ग्राऊंड प्रेपरेशन'बद्दल आहे.  शारीरिक तयारीबरोबरच तुम्हाला मुलाची मानसिक तयारीसुद्धा केली पाहिजे. लेखक 'व्हिज्युअल थर्मोमीटर' नावाच्या एका उपकरणाचा वापर मुलाला शिकवण्यास सांगतात. या उपकरणामध्ये ट्रॅफिक लाइटप्रमाणे हिरवा,पिवळा आणि लाल रंगांचा वापर केलेला असतो. या रंगांचा वापर करून  आपल्या भावना व्यक्त करण्याचे शिक्षण तुम्ही मुलाला देऊ शकता.

४. शाळेबरोबर सहयोग करा:

तुमचा मुलगा ज्या शाळेत जातो, त्या शाळेबरोबर तुम्ही एक कोलॅबरेशन किंवा सहयोगच करीत असता. प्रकरण ४ अशा सहयोगाचा पाया तयार करण्याबद्दल आहे.  अशा सहयोगासाठी  शाळेमध्ये आणि तुमच्यामध्ये माहितीची नियमित देवाणघेवाण असू द्या. त्यामुळे दोन्ही बाजूंमध्ये विश्वासाचे वातावरण निर्माण होईल आणि भविष्यातील संघर्ष टळू शकतील. यासाठी तुमच्या प्रतिक्रिया सकारात्मक असाव्यात, नकारात्मक असू नयेत. शाळा आणि तुमच्यामध्ये उत्तम सहयोग राहणे तुमच्या मुलासाठी हितकारक ठरेल.        

५. भावनांचा उद्रेक:

आपल्या मुलाच्या भावनांचा उद्रेक होऊन तो रडू लागणे , किंवा त्याचे चिडणे, ओरडणे कुठल्याही पालकांना  सहन न होणारी करणारी घटना आहे. लेखक सांगतात की असा उद्रेक अचानक होत नाही, तर तो अनेक लहान लहान अप्रिय घटनांचा एकत्रित परिणाम असू शकतो. कुठल्या घटनेने मुलाच्या भावनांचा उद्रेक होतो, याची तुम्हाला माहिती असेल तर शाळेला आधीच सांगून ठेवा.  इतरांच्या दृष्टीने किरकोळ असणारी पण मुलाच्या दृष्टीने महत्त्वाची असणारी एखादी गोष्ट, म्हणजे एखादे खेळणं, कीचेन किंवा आणखी कुठली गोष्ट , जिने त्याच्या भावनांचा उद्रेक शांत होऊ शकतो, अशी कुठलीही गोष्ट मुलाजवळ द्यावी. कधी हे शाळेच्या नियमात बसत नाही. मग तुम्हाला शाळेला ते पटवून द्यावे लागेल.

६, ७ - अडथळ्यांचा सामना:

नवीन परिस्थितीचा सामना करावा लागला तर आपण आपल्या अनुभवाच्या जोरावर अशा परिस्थितीतून मार्ग काढू शकतो. ऑटिस्टिक व्यक्तीपाशी अशा अनुभवाचा अभाव असणे मोठा अडथळा आहे. नवीन परिस्थितीचा सामना करताना ऑटिस्टिक व्यक्ती गडबडून जाण्याची शक्यता असते. 

लेखकांनी प्रकरण ६ आणि ७ मध्ये अशा अडथळ्यांचा विचार केला आहे. लेखक सांगतात की पालकांनी मुलांच्या सर्व समस्या स्वत: सोडवण्यापेक्षा अडथळ्यांना तोंड देण्यासाठी त्यांच्या मुलाला विकसित केले पाहिजे.

८. सॅच्युरेशन  (Saturation) मॉडेल:

अपंगत्वाचे वैद्यकीय मॉडेल मानते की  अपंग लोक त्यांच्या कमजोरी किंवा फरकांमुळे अक्षम आहेत तर सॅच्युरेशन मॉडेलप्रमाणे अपंग लोक समाजाच्या विशिष्ट धारणेमुळे अक्षम आहेत. सॅच्युरेशन मॉडेल ऑटिस्टिक व्यक्तींना समाजात इतरांच्या बरोबरीने वागण्याची संधी देते.

९. गुंड प्रवृत्तीचा सामना:
शाळेत गुंड प्रवृत्तीची काही मुले असतात. तुमच्या मुलास अशा प्रवृत्तीच्या मुलांपासून त्रास होत असेल तर काय करावे याचा विचार प्रकरण ९ मध्ये आहे. जर तुमच्या मुलाशी कुणी गुंडगिरी करीत असेल तर  मुलाच्या संपर्कात राहा आणि वेळीच शाळेला माहिती द्या.

१०. मित्रांची आवश्यकता:

शाळेत, मुलांसाठी मित्र असणे आवश्यक आहे.  प्रकरण १० मध्ये  लेखक असे सुचवतात की मुलांचे मैत्रीपूर्ण संबंध वाढण्यासाठी शाळांनी क्लब स्थापन करावे आणि मुलांमध्ये मैत्री वाढेल असे विविध  उपक्रम  करावे.

११,१२ - शाळेबरोबर मतभेद:

तुमचे शाळेबरोबर मतभेद होत असतील तर काय करावे याचा विचार प्रकरण ११ आणि १२  मध्ये केला आहे. 

अशा परिस्थितीत लेखक संघर्षापेक्षा समन्वयावर भर देतात. तुमची भूमिका तुम्ही शाळेला नम्रपणे परंतु ठामपणे समजावून सांगितली पाहिजे.

१३. शाळेला निरोप:

एवढे करूनही तुमचे शाळेबरोबर जमत नसेल आणि शाळा बदलण्याची वेळ आलीच तर त्याचीही तयारी ठेवली पाहिजे आणि शाळेचा निरोप घेताना कटुता टाळून पुन्हा संबंध प्रस्थापित करण्याची शक्यता ठेवली पाहिजे हे प्रकरण १३ मध्ये सांगितले आहे.

१४. आदर्श शाळा:

अखेरच्या चौदाव्या प्रकरणात लेखक आपली ऑटिस्टिक मुलांच्या आदर्श शाळेची कल्पना स्पष्ट करतात. लेखकांच्या मते अशा शाळेत 'टॉप डाऊन कल्चर' असावे. म्हणजे वरिष्ठ पातळीवर अनुभवी लोकांचे व्यवस्थापक मंडळ असावे आणि त्यांनी घेतलेल्या निर्णयांची खालच्या पातळीपर्यंत अंमलबजावणी व्हावी. अशा शाळेचे व्यवस्थापन लवचिक, म्हणजे परिस्थितीप्रमाणे बदल करता येईल असे असावे. शाळेत समवयस्क गटांसाठी प्रशिक्षण असावे. उपचारापेक्षा प्रतिबंध चांगला हे तत्त्व ध्यानात घेऊन एखादी अप्रिय घटना कशी टाळता येईल, याचा विचार करून शाळेचे व्यवस्थापन व्हावे.

समीक्षा: 🔬 

हे पुस्तक यूके मधील शालेय परिस्थिती समोर ठेवून लिहिले आहे.  परंतु पुस्तकात केलेले मार्गदर्शन सर्वच ठिकाणच्या शालेय परिस्थितीत  लागू होईल असे आहे. खरे तर पुस्तकाचा विषय प्राथमिक शाळेतून माध्यमिक शाळेत स्थलांतराचा आहे. पण लेखकांनी असा फरक कुठे स्पष्ट केलेला नाही. पुस्तकातील चर्चा शालेय प्रवेशाविषयी आहे. हा विषयच असा आहे की येथे कुठल्याही रेडिमेड सोल्यूशनची अपेक्षा करता येत नाही.  ऑटिस्टिक मुलाचे शालेय जीवन आणि संगोपन यांविषयी सामान्य स्वरूपाचे मार्गदर्शन असे या पुस्तकाबद्दल म्हणता येईल. माझे या पुस्तकाचे रेटिंग 'थ्री स्टार' आहे.

पुस्तक परिचय:

पुस्तकाचे नाव: Championing your autistic teen at secondary school-getting the best from mainstream settings

लेखक : Debby Elly with Garreth D. Morewood

पुस्तकाची रूपरेषा:

हे पुस्तक चौदा प्रकरणांमध्ये विभागलेले आहे.  या चौदा प्रकरणांमध्येलेखक ऑटिस्टिक मुलाने  प्राथमिक शाळेतून माध्यमिक शाळेत प्रवेश घेऊन तेथे यशस्वी होण्यापर्यंत  विविध  विषयांची चर्चा करतात आणि वाचकाला बरीच उपयुक्त माहिती देतात.

लेखक-परिचय:

या पुस्तकाचे लेखक गॅरेथ डी मोरेवुड स्टुडिओ थ्री साठी शैक्षणिक सल्लागार आहेत.  यापूर्वी त्यांनी यूकेच्या शाळांमध्ये २५ वर्षे काम केले आहे. 

पुस्तकाच्या सहलेखिका  डेबी एली या जुळ्या ऑटिस्टिक मुलांच्या माता आहेत. त्यामुळे त्यांच्या लेखनाला स्वानुभवाचा पैलू आहे. त्या प्रादेशिक वृत्तपत्रांमध्ये उप-संपादक आहेतत्यानंतर २००८ ते २०२१ पर्यंत चाललेल्या ऑ-किड्स या मासिकाच्या त्या सह-संस्थापक  होत्या.  त्या फ्रीलान्स ट्रेनरलेखक आणि सल्लागार म्हणून काम करतात.  त्यांनी ऑटिझमवर अनेक लेख आणि पुस्तके लिहिली आहेत.

डिस्क्लेमर:

गॅरेथ डी. मोरेवुड  आणि डेबी एली यांनी   लिहिलेल्या 'चॅम्पियनिंग युवर ऑटिस्टिक टीन ॲट सेकंडरी स्कूल-गेटिंग द बेस्ट फ्रॉम मेनस्ट्रीम सेटिंग्जया पुस्तकाची ही संक्षिप्त समीक्षा आहे. 

समीक्षक पुस्तकावर कोणत्याही प्रकारच्या कॉपीराइटचा दावा करत नाही.  कॉपीराइट लेखक/प्रकाशकाकडे आहे.  पुस्तकातील संदर्भ आणि त्यातील आशयाची चर्चा केवळ शिक्षण आणि मनोरंजनासाठी आहे

Review by Dr Hemant Junnarkar 

© Dr Hemant Junnarkar, All Rights Reserved

Saturday, October 12, 2024

स्वकृत भक्तिरचना

हनुमानस्तुती:


धन्य मारुतीराया | सीतामाईस शोधिले ||

द्रोणागिरी आणूनीया | लक्ष्मणास वाचविले ||

Friday, October 11, 2024

दिगंबरा दिगंबरा (भजन)



(c) Dr Hemant Junnarkar, All rights reserved

(प्रस्तुत भजन १८ चरणांचे असून ते सकाळ, दुपार, संध्याकाळ दोन दोन वेळा म्हटले तर 'दिगंबरा दिगंबरा' मंत्राचा १०८ वेळा जप होईल. या भजनात श्रीदत्तांची नावे आहेत. त्यामुळे श्रीदत्ताचे नामस्मरण होईल. शिवाय या भजनात श्रीनवनाथादी दत्तसंप्रदायातील अवतारांचा उल्लेख आहे. त्यामुळे त्यांचेही स्मरण होईल. वाचकांनी जरूर प्रतिक्रिया कळवाव्यात.)

दिगंबरा दिगंबरा (भजन)

ब्रह्मा-विष्णु-शिवस्वरूपा

परब्रह्मा विश्वेश्वरा

दिगंबरा दिगंबरा 

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा || १ ||


भावातीता द्वंद्वातीता

त्रिगुणातीता निर्विकारा

दिगंबरा दिगंबरा 

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा || २ ||


अवधूता अत्रिनंदना

रुद्रा श्रीशैलवनचरा

दिगंबरा दिगंबरा 

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा || ३ ||


अनसूयात्मज भक्ततारका

दयासागरा मनोहरा

दिगंबरा दिगंबरा

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा || ४ ||


चित्स्वरूपा आनंदकंदा

सर्वव्यापी जगदाधारा

दिगंबरा दिगंबरा

श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा || ५ ||


भक्तरक्षका गिरिधरा

सृष्टिचालका जगदीश्वरा

दिगंबरा दिगंबरा

श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा || ६ ||


षड्रिपुनाशक    भवभयहारक

कलिमलक्षालक सुरवरा

दिगंबरा दिगंबरा

श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा || ७ ||


भूतप्रेतभयहारका

सर्वमंगला शुभंकरा

दिगंबरा दिगंबरा

श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा || ८ ||


कामधेनुच्या पालका 

श्वानरूपवेदाधारा

दिगंबरा दिगंबरा

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा || ९ ||


वास गाणगापुरी तुझा

औदुंबरतळ तुझा निवारा

दिगंबरा दिगंबरा

श्रीपाद वल्लभ दिगंबरा || १० ||


श्रीपाद होसी पिठापुरा

नृसिंह अन् नृसिंहपुरा 

दिगंबरा दिगंबरा 

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा || ११ ||


मच्छिंद्रा अन् गोरक्षा

गहिनीनाथा जालंदरा

दिगंबरा दिगंबरा 

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा || १२ ||


कानिफनाथा भर्तृहरी 

चर्पटी-रेवण-नागेश्वरा

दिगंबरा दिगंबरा 

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा || १३ ||


शेगावीच्या गजानना

शिर्डीच्या साईश्वरा 

दिगंबरा दिगंबरा 

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा ||१४||


अक्कलकोटी स्वामी समर्था

धनकवडीच्या श्रीशंकरा 

दिगंबरा दिगंबरा 

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा ||१५ ||


वासुदेव माणगावी

नित्यानंद गणेशपुरा 

दिगंबरा दिगंबरा 

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा || १६ ||


कलियुगात नानारूपे

अवतरसी भक्तोद्धारा 

दिगंबरा दिगंबरा 

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा || १७ ||


माथी वाहीन तुझ्या पादुका

भावभक्तिने गुरुवरा

दिगंबरा दिगंबरा 

श्रीपादवल्लभ दिगंबरा || १८ ||

|| श्रीदत्तात्रेयार्पणमस्तु ||